रायपुर। नवा रायपुर की जंगल सफारी वन विभाग के लिए अब सफेद हाथी बन चुकी है। 300 करोड़ रुपए फूंकने के बाद भी यह जगह पर्यटकों को लुभाने में नाकाम रही है। हालत यह है कि सफारी हर साल 18 करोड़ रुपए के भारी घाटे में चल रही है। अब बाघ और शेरों का पेट पालना भी विभाग के बजट पर भारी पड़ रहा है। खर्च का यह बोझ कम करने के लिए अब जानवरों को बड़े औद्योगिक घरानों को गोद देने की तैयारी है। इसके लिए कॉरपोरेट कंपनियों को पत्र लिखे जा रहे हैं।

योजना साफ है। मांसाहारी जानवरों के भोजन और उनके महंगे इलाज का पूरा जिम्मा निजी कंपनियों को सौंपा जाएगा। अगर कॉरपोरेट सेक्टर से अच्छा रिस्पांस नहीं मिला तो पूरी सफारी को पीपीपी मोड पर चलाने का विचार है। 1 नवंबर 2016 को जब 800 एकड़ में इस सफारी का उद्घाटन हुआ था तब इसे एशिया की सबसे बड़ी मानव निर्मित सफारी बताया गया था। हर्बिवोर भालू टाइगर और लायन सफारी के साथ 130 एकड़ का खांडवा जलाशय विकसित किया गया। उस समय दावे किए गए थे कि यहां ओरंगुटान जिराफ और चिंपांजी जैसे 10 अलग अलग प्रजाति के विदेशी जानवर लाए जाएंगे। आज 10 साल बाद भी विदेशी जानवरों के लिए बनाए गए करोड़ों के बाड़े खाली पड़े हैं।

विदेशी जानवर लाने की जो इकलौती कोशिश हुई वह भी प्रबंधन की लापरवाही से नाकाम हो गई। नया आकर्षण पैदा करने के लिए गुजरात के वनतारा से जेब्रा का एक जोड़ा लाया गया था। इसके बदले में जंगल सफारी प्रबंधन ने अपना बेहद दुर्लभ सफेद भालू वनतारा को दे दिया। यह एक्सचेंज पूरी तरह फेल साबित हुआ। जेब्रा को पर्यटकों के लिए बाड़े में छोड़ा जाता उससे पहले ही दोनों की मौत हो गई। एक जेब्रा को सांप ने काट लिया और दूसरा जेब्रा बीमारी का शिकार हो गया। जब जेब्रा बीमार पड़ा तब भी सफारी के डॉक्टरों ने वनतारा के विशेषज्ञों से कोई मदद या सलाह लेना जरूरी नहीं समझा। छह महीने के भीतर विदेशी जानवर का यह इकलौता आकर्षण खत्म हो गया।

लगातार बढ़ रहे इस घाटे की भरपाई के लिए सफारी प्रबंधन ने आम जनता की जेब काटना शुरू कर दिया है। करीब दो महीने पहले सफारी और जू के टिकट के दाम सीधे दोगुने कर दिए गए। सामान्य बस का किराया 100 से बढ़ाकर 150 रुपए और एसी बस का 200 रुपए कर दिया गया है। पहले 12 साल तक के बच्चों की एंट्री मुफ्त हुआ करती थी। अब इस छूट को घटाकर 6 साल कर दिया गया है। 6 से 12 साल के बच्चों की एंट्री फीस 100 रुपए तय कर दी गई है। जू में भी 50 रुपए का टिकट अब आम लोगों के लिए 100 रुपए का हो गया है।

इस पूरे प्रोजेक्ट पर अभी 500 करोड़ रुपए और खर्च करने की रूपरेखा फाइलों में बनी हुई है। लेकिन फिलहाल विभाग की पहली प्राथमिकता जानवरों के रोजमर्रा के खर्च निकालना है। जंगल सफारी के साथ बिलासपुर के कानन पेंडारी में भी कॉरपोरेट एडॉप्शन लागू करने का प्रयास चल रहा है। पीसीसीएफ वाइल्ड लाइफ ओपी यादव के अनुसार वन्य प्राणियों को औद्योगिक घरानों को गोद देने पर सैद्धांतिक सहमति बन गई है। शुरुआत में कंपनियों को पत्र भेजे जा रहे हैं और इसके बाद ही निजीकरण या अन्य विकल्पों की तरफ कदम आगे बढ़ाया जाएगा।