रायपुर। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा सरकारी बस सेवा फिर से शुरू करने के फैसले ने छत्तीसगढ़ में पुरानी बहस छेड़ दी है। यहां आम आदमी आज भी सस्ती और नियमित परिवहन सेवा के लिए तरस रहा है, जबकि नीति बनाने वाले अफसरों के आवागमन पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं। छत्तीसगढ़ में राज्य परिवहन निगम को साल 2002 में घाटे का हवाला देकर बंद कर दिया गया था। उसके बाद से सरकारी बसें लगभग गायब हो गईं। निजी बसें सीमित रूट पर चलती हैं, किराया महंगा है और ग्रामीण इलाकों में नियमित सेवा का अभाव है। नतीजा यह है कि आम नागरिक निजी वाहनों या महंगे विकल्पों पर निर्भर रहने को मजबूर है।

      इसके उलट नवा रायपुर और राजधानी क्षेत्र में तैनात अधिकारियों को प्रतिमाह 250 लीटर तक पेट्रोल की सुविधा मिलती है। अनुमान है कि इस मद में सालाना करीब 30 करोड़ रुपये खर्च हो जाते हैं। अफसरों के आवागमन के लिए व्यवस्था तो बनी हुई है, लेकिन आम जनता के लिए सस्ती बस सेवा की कोई ठोस योजना अभी तक नहीं बनी।

किसको कितना नुकसान

सरकारी बस न होने का सबसे सीधा असर आम यात्री की जेब पर पड़ता है। ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में बस सेवा सीमित होने से लोग निजी वाहनों या महंगे किराए पर निर्भर हैं। इससे सिर्फ यात्रा खर्च नहीं बढ़ता, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी भी प्रभावित होती है।

 

  • - मरीज अस्पताल पहुंचने के लिए महंगे विकल्प चुनने को मजबूर हैं।  
  • - विद्यार्थी कॉलेज और कोचिंग तक नियमित पहुंच नहीं बना पाते।  
  • - युवा परीक्षा, इंटरव्यू और रोजगार के अवसरों से वंचित रह जाते हैं।  
  • - महिलाएं अकेले सफर में सुरक्षित और नियमित विकल्प न होने से परेशान हैं।  
  • - किसान और छोटे कारोबारी बाजार पहुंच का खर्च बढ़ा महसूस करते हैं।  
  • - गांवों में सरकारी सेवाओं तक पहुंच भी मुश्किल हो जाती है।

24 साल बाद भी गंभीरता क्यों नहीं?

 पिछले 24 वर्षों में सरकारें बदलीं, नीतियां बदलीं और परिवहन का तरीका भी बदला। लेकिन राज्य परिवहन निगम को फिर से खड़ा करने या उसका विकल्प तैयार करने पर गंभीर चर्चा नहीं हुई। अब सवाल सिर्फ यह नहीं रह गया कि पुराना निगम वापस आए या नहीं। बड़ा सवाल यह है कि सरकार सार्वजनिक परिवहन को सिर्फ घाटे वाली संस्था मानकर चल रही है या इसे सामाजिक-आर्थिक विकास का जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर मानती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि पुराने मॉडल को जस-का-तस लाने की जरूरत नहीं। सरकार बसें उपलब्ध कराकर निजी ऑपरेटरों से संचालन करवा सकती है। कम यात्री वाले रूट पर वायबिलिटी गैप फंडिंग दे सकती है। इलेक्ट्रिक बसों के जरिए चरणबद्ध नेटवर्क भी तैयार किया जा सकता है। इससे घाटे का दबाव कम होगा और आम आदमी को राहत मिलेगी। मध्य प्रदेश में सरकारी बसों ने फिर रफ्तार पकड़ी है। छत्तीसगढ़ में भी सिटी बस जैसी योजनाएं चल रही हैं, लेकिन ग्रामीण और अंतर-जिला कनेक्टिविटी अभी भी कमजोर है। अब जरूरत है कि सरकार इस असमानता को दूर करने के लिए ठोस कदम उठाए। अफसरों के पेट्रोल खर्च की व्यवस्था बनी रह सकती है, लेकिन आम जनता को भी सस्ती और सुरक्षित परिवहन सुविधा मिलनी चाहिए।