बिलासपुर: न्यायधानी बिलासपुर में कानून व्यवस्था और प्रशासन का इकबाल कैसे रेत के ढेर में दफन हो गया है, इसकी जीती-जागती और खौफनाक तस्वीर कोनी क्षेत्र से सामने आई है। यहां रेत माफिया अब 'चोर-उचक्कों' की तरह नहीं, बल्कि 'सिस्टम के दामाद' की तरह खुलेआम डकैती कर रहे हैं। हैरत और बेशर्मी की बात यह है कि यह पूरा खेल शहर से बाहर किसी वीराने में नहीं, बल्कि संभाग के सबसे बड़े अफसर यानी कमिश्नर ऑफिस के ठीक पीछे चल रहा है!

नदी के बीच प्राइवेट सड़क और रात में हाई-वोल्टेज सर्कस

'ऑपरेशन रेत' का यह नजारा किसी कॉर्पोरेट प्रोजेक्ट से कम नहीं है। रात का अंधेरा घिरते ही अरपा नदी के तट पर हाई-वोल्टेज लाइटें जगमगा उठती हैं और रात को दिन में बदल दिया जाता है। माफियाओं का दुस्साहस देखिए कि उन्होंने नदी के बीचों-बीच बाकायदा एक 'प्राइवेट कच्चा रास्ता' ही तैयार कर लिया है। इसी रास्ते से भारी-भरकम जेसीबी मशीनें धड़ल्ले से नदी के सीने पर उतरती हैं और बेदर्दी से रेत नोचती हैं। लाइन से खड़े हाइवा और ट्रैक्टरों में रेत भरकर रातों-रात शहर भर में सप्लाई की जा रही है। यह कोई एक दिन का खेल नहीं है, बल्कि पूरा मैकेनिज्म पहले से सेट है और प्रशासन कुंभकर्णी नींद सो रहा है।

खनिज अफसर या माफियाओं के 'बचाव मंत्री'?

सबसे बड़ा और तीखा सवाल यही है कि कमिश्नर दफ्तर से चंद कदमों की दूरी पर इतना बड़ा 'सेटअप' लग गया और किसी को भनक तक नहीं लगी? जब मीडिया की दबिश से बवाल मचा तो खनिज अधिकारी राजू यादव का जो बयान आया, वह माफियाओं की करतूत से भी ज्यादा हास्यास्पद है। जनाब फरमाते हैं कि जेसीबी से जो रेत निकाली जा रही थी, वह वन विभाग की अनुमति से प्लांटेशन के किनारे डालने के लिए निकाली जा रही थी। वाह रे प्रशासन! एक प्लांटेशन के लिए नदी के बीच सड़क बनाकर, हाईमास्ट लाइटें लगाकर और हाइवा की लाइन लगाकर रेत निकाली जा रही है, और अफसर इसे नियम सम्मत बताने में जुटे हैं। ऐसा लगता है मानो खनिज विभाग अब कार्रवाई करने के बजाय रेत माफियाओं का पीआर (PR) और बचाव का जिम्मा संभाल चुका है।

रात में 'थोक', दिन में 'चिल्लर' का कारोबार

माफियाओं की यह फैक्ट्री 24 घंटे चल रही है। रात का 'हैवीवेट' खेल खत्म होता है तो सुबह 'शिफ्ट' बदल जाती है। सुबह भारी मशीनें और सेटअप भले ही नजरों से ओझल कर दिए जाते हैं, लेकिन ट्रैक्टरों का रेला दिन के उजाले में भी बेखौफ नदी को छलनी करता रहता है। तखतपुर विकासखंड के अमलीकांपा जैसे इलाकों में भी अवैध खनन की यही कहानी बदस्तूर जारी है। सड़कों पर फर्राटे भरते रेत से लदे ये वाहन पुलिस की पेट्रोलिंग और चेकपोस्ट पर भी करारा तमाचा जड़ रहे हैं।

अरपा की मौत का जिम्मेदार कौन?

इस अंधी लूट ने अरपा नदी के स्वरूप को पूरी तरह बिगाड़ कर रख दिया है। प्राकृतिक संरचना बर्बाद हो रही है, किनारों का कटाव बढ़ रहा है और जलस्तर पाताल में जा रहा है। माफियाओं की तिजोरी भरने के लिए पर्यावरण की सरेआम हत्या की जा रही है।

बिलासपुर का यह नजारा खोखले दावों और सिस्टम की हकीकत का आईना है। जब कमिश्नर के नाक के नीचे माफियाओं का यह 'सर्कस' चल रहा है, तो दूर-दराज के इलाकों में क्या हश्र हो रहा होगा? सवाल यह है कि इस 'खुली लूट' का असली सरगना कौन है, जिसके आगे पूरा का पूरा जिला प्रशासन नतमस्तक नजर आ रहा है?