बिलासपुर : छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (सीजीपीएससी) की मुख्य परीक्षा की उत्तरपुस्तिकाओं के पुनर्मूल्यांकन और साक्षात्कार के लिए अभ्यर्थियों के चयन को चुनौती देने वाली दो याचिकाओं को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है। जस्टिस बी डी गुरु की सिंगल बेंच ने स्पष्ट किया कि जब भर्ती नियमों में उत्तरपुस्तिकाओं के पुनर्मूल्यांकन का प्रावधान ही नहीं है, तब अदालत दोबारा मूल्यांकन का निर्देश नहीं दे सकती। कोर्ट ने यह भी कहा कि मूल्यांकन के मामलों में न्यायालय विशेषज्ञ समिति की भूमिका नहीं निभा सकता।

608 अभ्यर्थी पहुंचे न्यूनतम अर्हता अंक तक

सीजीपीएससी ने 265 पदों पर भर्ती के लिए 26 नवंबर 2025 को विज्ञापन जारी किया था। मुख्य परीक्षा का परिणाम 31 अगस्त 2026 को घोषित किया गया। आयोग के मुताबिक, निर्धारित न्यूनतम अर्हता अंक हासिल करने वाले कुल 608 अभ्यर्थी ही साक्षात्कार के लिए पात्र पाए गए।

याचिकाकर्ताओं ने उठाया 1:3 अनुपात का मुद्दा

याचिकाकर्ता निमिषिलेश सोनी, नीरज कुमार और अन्य ने मांग की थी कि उत्तरपुस्तिकाओं की दोबारा जांच के लिए स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति गठित की जाए और पूरी चयन प्रक्रिया को निरस्त किया जाए। उनका तर्क था कि 265 पदों के मुकाबले करीब तीन गुना अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के लिए बुलाया जाना चाहिए था।

आयोग: नियमों में न्यूनतम अंक तय

आयोग की ओर से कोर्ट को बताया गया कि भर्ती नियमों के अनुसार अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए न्यूनतम 33 प्रतिशत, जबकि आरक्षित वर्ग के लिए 23 प्रतिशत अंक निर्धारित हैं। इन्हीं न्यूनतम अंकों को हासिल करने वाले अभ्यर्थियों की संख्या 608 रही। इसलिए इससे अधिक अभ्यर्थियों को केवल 1:3 अनुपात पूरा करने के लिए साक्षात्कार में बुलाने का आधार नहीं बनता।

हाईकोर्ट: किसी पात्र अभ्यर्थी को बाहर रखने का प्रमाण नहीं

हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर सके कि न्यूनतम अर्हता अंक हासिल करने वाले किसी अभ्यर्थी को साक्षात्कार की प्रक्रिया से बाहर रखा गया है। ऐसे में केवल इस आधार पर कि पदों की तुलना में साक्षात्कार के लिए अभ्यर्थियों का अनुपात 1:3 नहीं रहा, पूरी चयन प्रक्रिया को गलत नहीं ठहराया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला

जस्टिस बी डी गुरु की अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के विकेश कुमार गुप्ता बनाम राजस्थान राज्य और रणविजय सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के फैसलों का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि यदि भर्ती नियमों में पुनर्मूल्यांकन का प्रावधान नहीं है, तो अदालत उत्तरपुस्तिकाओं के पुनर्मूल्यांकन का आदेश नहीं दे सकती। साथ ही मूल्यांकन से जुड़े मामलों में अदालत को विशेषज्ञ की भूमिका अपनाने से बचना चाहिए। इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाएं खारिज कर दीं, जिससे सीजीपीएससी मुख्य परीक्षा के परिणाम और उसके आधार पर आगे बढ़ रही साक्षात्कार प्रक्रिया को चुनौती देने वाली मांगों को राहत नहीं मिल सकी।