रायपुर। छत्तीसगढ़ राज्य में बीते छह वर्षों के दौरान उजागर हुए आठ बड़े मामलों ने भ्रष्टाचार के बड़े नेटवर्क को सामने ला दिया है। इन मामलों में महादेव सट्टा, कोल लेवी, शराब घोटाला और डीएमएफ जैसी वित्तीय अनियमितताएं शामिल हैं। ईडी, ईओडब्ल्यू, आईटी और सीबीआई जैसी केंद्रीय व राज्य की जांच एजेंसियां कुल 10,933 करोड़ रुपए की कथित धांधली की जांच कर रही हैं। इन एजेंसियों ने कार्रवाई करते हुए अब तक 5,378 करोड़ रुपए की चल और अचल संपत्तियों को अटैच कर लिया है। इन संपत्तियों में राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों, आईएएस, कारोबारियों और प्रभावशाली राजनीतिक व्यक्तियों के नाम शामिल हैं।

क्या होगा अटैच की गई संपत्तियों का?

 

कानूनी जानकारों के अनुसार, जब तक मामले में अंतिम न्यायिक फैसला नहीं आ जाता, तब तक इन अटैच की गई संपत्तियों का उपयोग किया जा सकता है। परंतु, इन संपत्तियों को बेचना, गिरवी रखना, हस्तांतरित करना या उन पर कोई नया निर्माण करना पूरी तरह से प्रतिबंधित रहता है। यदि अदालत में आरोप सिद्ध हो जाते हैं, तो ये सारी संपत्तियां सरकार के अधिकार क्षेत्र में चली जाएंगी। इसके बाद राजसात की प्रक्रिया अपनाकर इन्हें नीलाम किया जाएगा और प्राप्त राशि को सरकारी खजाने में जमा कर दिया जाएगा।

समझिए संपत्ति अटैचमेंट से सुप्रीम कोर्ट तक की प्रक्रिया

वरिष्ठ अधिवक्ता फैजल रिजवी के मुताबिक, जब भी जांच एजेंसियां किसी घोटाले में काली कमाई या अवैध आय से खरीदी गई प्रॉपर्टी का पता लगाती हैं, तो सबसे पहले उसे अस्थायी रूप से कुर्क (अटैच) किया जाता है।

  एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी:

ईडी अपनी इस कार्रवाई के बाद 30 दिन के भीतर प्रकरण को नई दिल्ली स्थित एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी में भेजती है।

 अपीलीय न्यायाधिकरण:

यदि अथॉरिटी के फैसले से संपत्ति मालिक को राहत नहीं मिलती, तो वह 45 दिनों के भीतर नई दिल्ली स्थित पीएमएलए अपीलीय न्यायाधिकरण में अपील दायर कर सकता है।

 हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट:

 वहां से भी निर्णय पक्ष में न आने पर 60 दिनों के भीतर संबंधित हाईकोर्ट और अंततः सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।

मनी लॉन्ड्रिंग से संबंधित मुख्य मामले की सुनवाई रायपुर की विशेष पीएमएलए कोर्ट में की जाती है और इसी अदालत का अंतिम फैसला मान्य होता है। वहीं, एसीबी और ईओडब्ल्यू के प्रकरणों की सुनवाई विशेष अदालत में होती है। आरोपी अपने वैध आय के दस्तावेज प्रस्तुत करके या मुख्य केस में बरी होकर अपनी प्रॉपर्टी रिलीज करा सकता है। कोई निर्दोष खरीदार या बैंक भी अपने वैध दावे के आधार पर संपत्ति पर अधिकार मांग सकता है।

अधिकारियों और कारोबारियों पर कसा शिकंजा

जांच एजेंसियों की कार्रवाई में कई बड़े नाम शामिल हैं:

  महादेव सट्टा मामला: प्रमोटर सौरभ चंद्राकर की दुबई के बिजनेस बे, बुर्ज खलीफा और दुबई हिल्स एस्टेट में लगभग 1,700 करोड़ रुपए की संपत्तियां अटैच की गई हैं। विकास गर्ग की 940.77 करोड़, हरिशंकर तिबरेवाल की 388 करोड़ और रवि उप्पल की 21.45 करोड़ रुपए की संपत्तियों पर कार्रवाई हुई है।

 कोल लेवी मामला: इसमें सूर्यकांत तिवारी और उनके करीबियों की 150 करोड़ रुपए, राज्य प्रशासनिक सेवा की अधिकारी सौम्या चौरसिया की 23 करोड़, निलंबित आईएएस रानू साहू की 5.52 करोड़ तथा समीर विश्नोई की 4 करोड़ की संपत्तियों को अटैच किया गया है।

घोटालों और अटैचमेंट का गणित

जांच के दायरे में आए मामलों और कुर्क संपत्तियों का विवरण इस प्रकार है:

 

 महादेव सट्टा:6000 करोड़ की अनियमितता (3800 करोड़ की संपत्ति अटैच — ईडी, ईओडब्ल्यू, सीबीआई)

 आबकारी: 3200 करोड़ का मामला (1200 करोड़ की संपत्ति अटैच — ईडी, ईओडब्ल्यू)

 कोल लेवी:540 करोड़ की धांधली (273 करोड़ की संपत्ति अटैच — ईडी, ईओडब्ल्यू, सीबीआई)

  डीएमएफ: 575 करोड़ का घोटाला (21.47 करोड़ की संपत्ति अटैच — ईडी, ईओडब्ल्यू)

सीजीएमएससी: 411 करोड़ की अनियमितता (40 करोड़ की संपत्ति अटैच — ईडी, ईओडब्ल्यू)

  कस्टम मिलिंग: 175 करोड़ का मामला (19.38 करोड़ की संपत्ति अटैच — ईडी, ईओडब्ल्यू)

  भारतमाला:32 करोड़ की गड़बड़ी (23.35 करोड़ की संपत्ति अटैच — ईडी, ईओडब्ल्यू)

 सीजीपीएससी:

1 करोड़ का मामला (ईडी, ईओडब्ल्यू,

सीबीआई द्वारा जांच जारी)