बिलासपुर।छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित कोरबा डिस्ट्रिक्ट मिनरल फंड (DMF) घोटाले में जेल में बंद पूर्व IAS अधिकारी अनिल टुटेजा को बिलासपुर हाईकोर्ट से तगड़ा झटका लगा है। हाईकोर्ट ने उनकी जमानत याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की सिंगल बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि एक प्रभावशाली पद पर रहते हुए बड़े पैमाने पर पब्लिक फंड का गबन किया गया है, इसलिए ऐसे मामलों में जमानत नहीं दी जा सकती।

 

'सीनियर अफसर थे, गवाहों को कर सकते हैं प्रभावित

 

 

हाईकोर्ट ने जमानत नामंजूर करते हुए कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने माना कि टुटेजा औद्योगिक विभाग में एक बेहद प्रभावशाली और वरिष्ठ पद (एडिशनल सेक्रेटरी) पर थे। अगर उन्हें जमानत दी जाती है, तो इस बात की पूरी संभावना है कि वे बाहर आकर सबूतों के साथ छेड़छाड़ कर सकते हैं और गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि उन्होंने सप्लायर्स के साथ मिलकर बड़े पैमाने पर सरकारी पैसे का दुरुपयोग किया है, जिसका सीधा नुकसान आम जनता और समुदाय को हुआ है।

 

 

समानता (Parity) की दलील भी नहीं आई काम

 

टुटेजा के वकीलों ने कोर्ट में दलील दी थी कि इस मामले के अन्य सह-आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल चुकी है, लिहाजा 'पैरिटी' (समानता) के आधार पर उन्हें भी राहत दी जानी चाहिए। कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए केस रिकॉर्ड का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि आरोपी दीपेश टांक 8 महीने से 1 साल तक, जबकि रानू साहू और सौम्या चौरसिया 2 साल से ज्यादा समय तक जेल में रही हैं। इसके उलट, ईओडब्ल्यू (EOW) और एसीबी (ACB) द्वारा 23 फरवरी 2026 को गिरफ्तार किए गए टुटेजा को जेल में महज दो महीने ही हुए हैं। ऐसे में वे अन्य आरोपियों के साथ समानता का दावा बिल्कुल नहीं कर सकते।

 

16 करोड़ का कमीशन और पीसी एक्ट का शिकंजा

 

फैसले में इस बात का प्रमुखता से जिक्र है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) की धारा 7 और 12 के तहत टुटेजा की संलिप्तता प्रथम दृष्टया साबित होती है। केस डायरी के अनुसार, सतपाल सिंह छाबड़ा को अवैध कमीशन के तौर पर 16 करोड़ रुपये मिले थे, जिसमें से सीधा पेमेंट आवेदक (टुटेजा) को भी किया गया है। कोर्ट ने कहा कि 18 फरवरी 2025 को पुलिस के सामने दिए गए छाबड़ा के बयान की सच्चाई सामने लाने के लिए आरोपी की कस्टडी बेहद जरूरी है।

 

ट्रायल में देरी जमानत का आधार नहीं

 

बचाव पक्ष का यह भी तर्क था कि मामले में दस्तावेजों की भरमार है और कई गवाहों से पूछताछ होनी है, जिससे ट्रायल में लंबा वक्त लगेगा। इस पर जस्टिस व्यास की बेंच ने दो टूक कहा कि केवल ट्रायल में देरी होने से किसी भी आरोपी को जमानत पर रिहा होने का हक नहीं मिल जाता। अदालत को अपराध की गंभीरता और आरोपी की भूमिका देखनी होती है। इन्हीं सख्त टिप्पणियों के साथ अदालत ने जमानत याचिका खारिज कर दी, जिससे फिलहाल पूर्व IAS के जेल से बाहर आने के रास्ते बंद हो गए हैं।