जगत विज़न के खुलासे के बाद ईई जयंत बिसेन के 22 लाख के घोटाले की जांच तो बिठा दी गई, लेकिन जांचकर्ता वही सिद्दीकी हैं जिसके साले को 'पीस वर्क' में उपकृत किया गया था। उधर, 42 लाख डकारने वाले वेद प्रकाश पांडे को 9 माह बाद भी सत्ता का अभयदान जारी है। आखिर 100 करोड़ के महाघोटालेबाजों का असली आका कौन है?

 

राष्ट्रीय जगत विजन रायपुर। सत्ता के गलियारों में इन दिनों 'भ्रष्टाचार' कोई अपराध नहीं, बल्कि एक स्थापित शिष्टाचार बन गया है। जगत विज़न की खबर के असर से ईई जयंत बिसेन के 22 लाख रुपये के भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ तो हो गया, और रस्म-अदायगी के लिए विभाग ने विस्तृत जांच के आदेश भी जारी कर दिए। लेकिन इस तथाकथित जांच की असल हकीकत किसी भद्दे मजाक से कम नहीं है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कोई अधिकारी अपने ही साले के खिलाफ निष्पक्ष जांच कर सकता है? इस पूरे गोलमाल में जो ठेकेदार शामिल है, वह और कोई नहीं बल्कि जांचकर्ता सिद्दीकी का ही साला है। उसे 'पीस वर्क' में काम सिद्दीकी और बिसेन की जुगलबंदी ने ही दिलवाया था। अब अपने ही साले और भ्रष्ट साझीदार की जांच सिद्दीकी कैसे कर सकते हैं? इसे सीधे शब्दों में कहें तो— "चोर की जांच डकैत के हवाले की जा रही है।" जिसके खिलाफ खुद ढेरों शिकायतें और अपराध दर्ज हो चुके हैं, वह दागी अफसर अब न्याय की कुर्सी पर बैठकर क्लीन चिट बांटने का खेल खेलेगा।

सत्ता पक्ष के सुशासन के दावों की पोल केवल बिसेन और सिद्दीकी के मामले में नहीं खुल रही। इससे भी अधिक सोचनीय विषय वेद प्रकाश पांडे का है। इस अधिकारी ने अपने पेंशनर माता-पिता (मध्य प्रदेश) के नाम पर 42 लाख रुपये की चिकित्सा प्रतिपूर्ति राशि आहरित कर सरेआम डकार ली। नियमानुसार, यात्रा और चिकित्सा देयक में गबन प्रमाणित होने पर सीधे एफआईआर और बर्खास्तगी की कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन पुख्ता शिकायतों के 9 महीने बीत जाने के बाद भी पांडे पर कोई आंच नहीं आई।

विपक्ष के नेताओं ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए मजबूती से न्याय की मांग की है। विपक्ष और राष्ट्रीय जगत विज़न का यह सवाल पूरी तरह न्यायसंगत है कि अगर वेद प्रकाश पांडे को बख्श दिया गया है, तो पिछले दस वर्षों में जिन छोटे कर्मचारियों पर एफआईआर हुई है, उनके खिलाफ भी जांच बंद कर देनी चाहिए! क्या सरकार की राशि गबन करने वालों को वेद प्रकाश के समान 'अभयदान' देने का कोई नया नियम बन गया है? आखिर पांडे का वह रसूखदार संरक्षक कौन है, जो 100 करोड़ से अधिक के साबित भ्रष्टाचार पर कार्रवाई को रोक रहा है?

यह सत्ता पक्ष की सबसे बड़ी विफलता है कि प्रशासनिक तंत्र अब एक संगठित सिंडिकेट की तरह काम कर रहा है। बेलगाम ब्यूरोक्रेट्स ने जवाबदेही और पारदर्शिता के मूल सिद्धांतों को पैरों तले रौंद दिया है। अगर सरकार में थोड़ी भी नैतिकता और सुचिता बची है, तो सिद्दीकी जैसे दागी अधिकारियों से जांच छीनकर एक स्वतंत्र समिति से पूरे घोटाले की जांच कराई जानी चाहिए। वरना जनता अब समझ चुकी है कि इस सिस्टम में न्याय केवल फाइलों में बिकता है, और पारदर्शिता सत्ताधीशों के भाषणों का महज एक खोखला शब्द बनकर रह गई है।