कोंडागांव/रायपुर।छत्तीसगढ़ में जल संसाधन विभाग और भ्रष्टाचार का रिश्ता इतना गहरा है कि घोटालों की जांच फाइलें ही दागी अफसरों के प्रमोशन की सीढ़ी बन जाती हैं। इसका एक जीता-जागता और शर्मनाक उदाहरण है कोंडागांव जिले का कवोंगा एनीकट कम काजवे प्रोजेक्ट। भवरडीह नदी पर 4.74 करोड़ रुपये फूंक कर जो एनीकट खड़ा किया गया, वह महज डेढ़ साल में ही भरभरा कर टूट गया (breach)। लेकिन इससे भी बड़ा घोटाला यह है कि इस बर्बादी के मुख्य कर्ता-धर्ता रहे दागी अफसर 'शंकर ठाकुर' को सजा मिलने के बजाय, जल संसाधन विभाग के सर्वोच्च पद यानी प्रमुख अभियंता (ENC) की कुर्सी से नवाज दिया गया।

बजट पार, गुणवत्ता तार-तार

सरकारी फाइलों के आंकड़ों के मुताबिक, 2 जनवरी 2012 को इस प्रोजेक्ट के लिए 463.53 लाख रुपये की प्रशासकीय स्वीकृति मिली थी। यह मलाईदार ठेका अंबिकापुर की नेसार्ल तलाट कंस्ट्रक्शन आ-5 को दिया गया। अफसर और ठेकेदार की जुगलबंदी ने वास्तविक खर्च को 474.24 लाख रुपये तक पहुंचा दिया और मार्च 2014 में काम खत्म कर दिया गया। लेकिन निर्माण की गुणवत्ता इतनी घटिया थी कि पहली ही बड़ी चुनौती में एनीकट ने जल-समाधि ले ली और स्थानीय किसानों के खेतों तक पानी पहुंचने का सपना उसी मलबे में दफन हो गया।

 

जांच में सामने आई 'आपराधिक' लापरवाही

 

जब इंद्रावती परियोजना मंडल, जगदलपुर के अधीक्षण अभियंता (SE) ने मामले की प्रारंभिक जांच की, तो जो परतें उधड़ीं, वो किसी भी पारदर्शी व्यवस्था को शर्मसार करने के लिए काफी थीं:

 40 टन के डंपरों की दौड़: 

एनीकट के ठीक नीचे (करीब 100 मीटर दूरी पर) लोक निर्माण विभाग (PWD) का एक उच्च स्तरीय पुल बन रहा था। ठेकेदार और अफसरों की मिलीभगत से उस पुल के निर्माण सामग्री से लदे 40-40 टन के भारी डंपर इसी नवनिर्मित एनीकट के ऊपर से बेखौफ दौड़ते रहे। एनीकट के आसपास बेखौफ रेत खनन चलता रहा, जिससे नीचे की मिट्टी का धंसाव (Scouring) शुरू हो गया और अफसरों ने अपनी आंखें मूंदे रखीं।

 100 मीटर लंबे इस एनीकट पर सुरक्षा के नाम पर न कोई रेलिंग थी, न ही चेतावनी बोर्ड। ऊपर से 10-15 सेमी पानी बह रहा था और अंदर ही अंदर संरचना खोखली हो रही थी।

जांच टीम ने इसे ठेकेदार और पर्यवेक्षण अधिकारियों की स्पष्ट लापरवाही माना और सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण तथा अपील) नियम 1966 के तहत कड़ी विभागीय कार्रवाई की सिफारिश की।

दागी ENC ठाकुर: संगीन भ्रष्टाचार के मामलों के बावजूद प्रमोशन का खेल!

 

जांच रिपोर्ट के रडार पर 2009 से 2015 तक जमे रहे कई अफसर थे, लेकिन इसमें सबसे प्रमुख नाम था तत्कालीन अधिकारी शंकर ठाकुर का। एक ईमानदार व्यवस्था में ऐसे अफसर को तत्काल निलंबित कर आपराधिक मामला दर्ज किया जाता है, लेकिन छत्तीसगढ़ के 'सिस्टम' ने इस दागी को सिर-आंखों पर बिठाया।

जिस अफसर के कार्यकाल में 4.74 करोड़ जनता के पैसे पानी में बह गए, उसे पदोन्नत करते हुए पूरे प्रदेश के जल संसाधन विभाग का मुखिया यानी ENC (प्रमुख अभियंता) बना दिया गया। हैरानी की बात यह है कि ENC शंकर ठाकुर का नाम विवादों के लिए नया नहीं है। उन पर पहले से ही

और गंभीर विभागीय आरोप रहे हैं। उनका पूरा करियर विवादों और घोटालों के इर्द-गिर्द घूमता रहा है।

इतनी दागी छवि और एनीकट ध्वस्त होने की स्पष्ट जांच रिपोर्ट के बावजूद उन पर ईओडब्ल्यू (EOW) या एसीबी (ACB) का शिकंजा नहीं कसना कई गंभीर सवाल खड़े करता है। कोंडागांव की गरीब जनता और किसानों के हिस्से का टैक्स, भ्रष्ट अफसरों और ठेकेदारों की जुगलबंदी के एनीकट से बहकर उनकी निजी तिजोरियों में चला गया। यह मामला चीख-चीख कर बता रहा है कि जल संसाधन विभाग में 'लूट-तंत्र' किस कदर हावी है, जहां सजा के बदले 'ENC' की कुर्सी इनाम में दी जाती है।