रायपुर। छत्तीसगढ़ के सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने वाले मरीजों की सेहत के साथ बड़ा सिस्टेमेटिक खिलवाड़ हो रहा है। मुफ्त और गुणवत्तापूर्ण दवाएं उपलब्ध कराने का जिम्मा जिस छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉरपोरेशन (CGMSC) के कंधों पर है, उसका पूरा तंत्र अंधविश्वास पर टिका है। सिस्टम की सबसे बड़ी खामी यह है कि सीजीएमएससी जिन प्राइवेट लैब से दवाओं की क्वालिटी पास कराकर प्रदेश भर के अस्पतालों में सप्लाई कर रहा है, उन लैब्स की मॉनिटरिंग करने वाला कोई नहीं है। यानी, लैब में दवाइयां कैसे जांची जा रही हैं, वहां आधुनिक मशीनें या क्वालिफाइड स्टाफ हैं भी या नहीं, यह देखने के लिए सीजीएमएससी के पास कोई टीम ही नहीं है।

दागी लैब पर मेहरबानी, कागजों पर चल रहा खेल

वर्तमान में सीजीएमएससी ने 13 अलग-अलग लैब से दवाओं की टेस्टिंग का अनुबंध किया हुआ है। नियमतः बिना लैब टेस्ट के कोई भी दवा मरीजों तक नहीं पहुंचनी चाहिए। लेकिन, अफसरों ने लैब की रिपोर्ट को ही 'ब्रह्मवाक्य' मान लिया है। इस अंधी व्यवस्था की पोल पिछले साल ही खुल गई थी, जब 3 अलग-अलग लैब को सीजीएमएससी ने खुद नोटिस थमाया था। कारण यह था कि इन लैब्स ने जिन दवाओं को पास कर दिया था, वे बाद में अस्पतालों में घटिया (अमानक/NSQ) निकली थीं। मरीजों की जान जोखिम में डालने वाली इस लापरवाही के 6-7 महीने बीत जाने के बाद भी विभाग कुंभकर्णी नींद में है और अब तक लैब चेकिंग के लिए कोई मैकेनिज्म तैयार नहीं किया गया है।

21 दवाओं की रिपोर्ट लटकी, कार्रवाई पर ब्रेक

 

दस्तावेजों के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2025-26 में 27 से अधिक दवाओं के सैंपल जांच के लिए भेजे गए थे। इनमें से 6 दवाइयां सीधे तौर पर अमानक (NSQ) पाई गईं। हैरानी की बात यह है कि 21 से ज्यादा दवाओं की रिपोर्ट अब भी पेंडिंग है। लैब से रिपोर्ट न मिलने के कारण न तो दागी कंपनियों पर कार्रवाई हो पा रही है और न ही सिस्टम सुधर रहा है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी दबी जुबान में मानते हैं कि एक सख्त मॉनिटरिंग कमेटी की जरूरत है, लेकिन फाइलें ठंडे बस्ते में हैं।

 

3 साल में 36 दवाएं फेल: मरीजों को बांटी फंगस लगी गोलियां

 

बीते 3 सालों के आंकड़े डराने वाले हैं। अब तक 36 से ज्यादा दवाओं, सिरप और इंजेक्शन की क्वालिटी फेल हो चुकी है। पिछले ही साल 48 हजार से ज्यादा पैरासिटामोल टैबलेट्स में फंगस लगे होने का सनसनीखेज मामला सामने आया था। बैक्लोफेन, आयरन सुक्रोज और ग्लिमेपाइराइड जैसी जरूरी दवाएं टूटी हुई या गुणवत्ता विहीन मिली थीं। लैब टेस्ट में अमानक पाए जाने पर मेसर्स एजी पैरेंटेरल्स (हिमाचल प्रदेश) और मेसर्स डिवाइन लेबोरेट्रीज (गुजरात) को तीन साल के लिए ब्लैकलिस्ट जरूर किया गया, लेकिन बीमारी की मूल जड़ यानी 'लैब की कार्यप्रणाली' पर कोई कैंची नहीं चली।

 

चेयरमैन बोले- अब बनाएंगे योजना

इतनी बड़ी चूक के बावजूद सीजीएमएससी के चेयरमैन दीपक म्हस्के का रटा-रटाया जवाब सामने आया है। उनका कहना है, "निश्चित ही इस दिशा में काम किया जाएगा। निरीक्षण के लिए टीम नहीं है तो गठित करने की योजना तैयार की जाएगी। जीरो टॉलरेंस नीति के तहत कार्यवाही होगी।