
रायपुर/बिलासपुर: छत्तीसगढ़ में जल जीवन मिशन के तहत हर घर शुद्ध पेयजल पहुंचाने के लिए पिछले पांच सालों में करीब 14 हजार करोड़ रुपए पानी की तरह बहा दिए गए, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी रोंगटे खड़े कर देने वाली है। प्रदेश के 20 जिलों के 767 गांवों की करीब 10 लाख आबादी आज भी 'जहरीला' पानी पीने को मजबूर है। हालात इतने भयावह हैं कि इस दूषित पानी की वजह से प्रदेश में हर साल 100 से ज्यादा लोगों की मौत हो रही है।
लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी (PHE) विभाग की ग्राउंड रिपोर्ट में इस खतरनाक स्थिति का खुलासा हुआ है। सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच की यह खाई कई गांवों के लिए जानलेवा साबित हो रही है।
90 फीसदी गांवों के पानी में 'फ्लोराइड का जहर
रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदेश के 33 में से 13 जिलों का भू-जल तो सुरक्षित पाया गया है, लेकिन 20 जिलों के भू-जल में भारी प्रदूषण मिला है। इनमें से 90 प्रतिशत गांवों के पानी में फ्लोराइड की मात्रा मानक (1.5 मिलीग्राम प्रति लीटर) से कहीं ज्यादा पाई गई है। बाकी गांवों में आर्सेनिक, आयरन और टर्बिडिटी ने पानी को विषैला बना दिया है।
ग्राउंड जीरो की खौफनाक हकीकत
सुपेबेड़ा में किडनी फेल्योर से 99 मौतें
गरियाबंद जिले का सुपेबेड़ा गांव आर्सेनिक और फ्लोराइड का सबसे बड़ा शिकार है। यहां के दूषित पानी ने अब तक 99 लोगों की जान ले ली है। ग्रामीण महेंद्र बताते हैं कि चार महीने पहले ही उनके रिश्तेदार प्रेमजय क्षेत्रपाल की मौत किडनी खराब होने से हो गई। विडंबना देखिए कि गांव में 7 करोड़ की लागत से जल जीवन मिशन की पाइपलाइन बिछ गई है, लेकिन टंकियां आज भी अधूरी हैं और नलों से एक बूंद पानी नहीं टपका।
अभनपुर में हैंडपंप का नाम ही पड़ गया 'दालपानी'
राजधानी रायपुर से महज 40 किमी दूर अभनपुर के डोंगीतराई गांव में एक दर्जन हैंडपंप हैं, लेकिन पानी निकालते ही कुछ मिनटों में पीला हो जाता है और उससे मिट्टी के तेल जैसी बदबू आती है। पूरे गांव में सिर्फ एक हैंडपंप ऐसा है जिसके पानी में दाल गलती है। ग्रामीणों ने उस हैंडपंप का नाम ही 'दालपानी' रख दिया है।
एमसीबी में टेढ़े हो रहे बच्चों के दांत
मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर (MCB) जिले के लालपुर और तेंदूडांड गांव में फ्लोराइड युक्त पानी पीने से 11 साल के बच्चे मयंक और 38 साल के लालजी के दांत पूरी तरह टेढ़े हो गए हैं। सुरक्षित पानी के लिए महिलाओं को आज भी आधा किलोमीटर दूर पैदल जाना पड़ता है।
ऊर्जाधानी कोरबा के हालात सबसे बदतर
आंकड़ों पर गौर करें तो ऊर्जाधानी कोरबा में हालात सबसे ज्यादा खराब हैं। यहां सर्वाधिक 169 गांवों के पानी में फ्लोराइड मिला है। इसके बाद गरियाबंद के 77, सरगुजा के 74, बालोद के 66 और धमतरी के 61 गांवों का पानी पीने लायक नहीं है। रायपुर के 31, महासमुंद के 46 और राजनांदगांव के 2 गांवों (आलीखूंटा और भरेंगांव) में भी गंभीर जल प्रदूषण पाया गया है।
शरीर को खोखला कर रहा यह पानी
एमडी मेडिसिन डॉ. अब्बास नकवी के अनुसार, यह प्रदूषित पानी शरीर के लिए धीमा जहर है: फ्लोराइड: यह दांत, हड्डियां, और जोड़ों को गला देता है। लंबे समय तक पीने से किडनी और ब्रेन की गंभीर समस्याएं होती हैं।
आर्सेनिक:इससे ब्लड प्रेशर, त्वचा रोग, पेट की बीमारियों के साथ-साथ किडनी खराब होने और कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों का खतरा रहता है।
आयरन और टर्बिडिटी: पानी में मौजूद आयरन और वायरस लिवर, हार्ट और पाचन तंत्र को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे डायरिया जैसी बीमारियां होती हैं।
PHE मंत्री अरुण साव का दावा- कर रहे वैकल्पिक व्यवस्था
इस गंभीर मुद्दे पर लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के मंत्री अरुण साव का कहना है कि जहां भी दूषित पानी की जानकारी मिलती है, उस सोर्स को तत्काल बंद करवाकर वैकल्पिक व्यवस्था की जाती है। 'जल वाहिनी' के माध्यम से गांव-गांव में किट देकर पानी की टेस्टिंग कराई जा रही है। संभाग स्तर पर लैब बनाई गई हैं ताकि लोगों को शुद्ध पेयजल मिल सके।
बहरहाल, सवाल यह उठता है कि 14 हजार करोड़ खर्च होने के बाद भी अगर प्रदेश की 10 लाख आबादी 'दालपानी' वाले हैंडपंप और फ्लोराइड युक्त पानी पर निर्भर है, तो सरकारी योजनाओं का असल फायदा आखिर किसे मिल रहा है?

