मुंगेली: डोड़ा गांव की तस्वीर ने डबल इंजन सरकार के विकास और सुशासन के दावों के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ गांवों तक बिजली और नल से पानी पहुंचाने की योजनाओं की बात होती है, दूसरी तरफ ग्रामीणों का दावा है कि वे 45 दिनों से बिजली के लिए तरस रहे हैं और पीने के पानी के लिए 2 से 3 किलोमीटर की दूरी तय करने को मजबूर हैं।

सरकार से सवाल है कि क्या 45 दिनों तक बिजली का इंतजार करना ग्रामीणों की मजबूरी है या व्यवस्था की नाकामी? नया ट्रांसफॉर्मर लगाने के अगले ही दिन वह खराब हो गया, तो तत्काल वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई? CM हेल्पलाइन और बिजली विभाग में शिकायतों के बावजूद समस्या लंबी क्यों खिंची?

अगर गांव में जल जीवन मिशन की व्यवस्था है, तो नल में पानी क्यों नहीं? अगर बिजली व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए विभाग जिम्मेदार है, तो ग्रामीणों को कलेक्ट्रेट तक आने की नौबत क्यों आई? क्या प्रशासन तब तक इंतजार करता रहेगा, जब तक ग्रामीण अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए सड़कों पर उतरने को मजबूर न हो जाएं?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि राजधानी से कुछ ही दूरी पर बसे गांव में 45 दिनों तक बिजली और पानी का संकट बना रह सकता है, तो सरकार की जमीनी निगरानी व्यवस्था आखिर कहां है? क्या अधिकारियों की जिम्मेदारी सिर्फ शिकायत मिलने के बाद निर्देश जारी करने तक है, या यह सुनिश्चित करना भी उनकी जवाबदेही है कि समस्या वास्तव में खत्म हुई या नहीं?

अब आश्वासन नहीं, नतीजा चाहिए
कलेक्ट्रेट पहुंच चुके ग्रामीणों को एक और आश्वासन नहीं, बिजली की बहाली और नियमित पेयजल आपूर्ति चाहिए। कलेक्टर के निर्देश के बाद अब असली परीक्षा बिजली विभाग और प्रशासन की है। सरकार को यह जवाब देना होगा कि डोड़ा के ग्रामीणों को 45 दिनों का अंधेरा और पानी के लिए 3 किलोमीटर की दौड़ आखिर कब खत्म होगी। क्योंकि विकास की असली तस्वीर सरकारी दावों से नहीं, गांव के घर में जलते बल्ब और नल से निकलते पानी से तय होती है।