रायपुर । छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेस कॉर्पोरेशन (CGMSC) में दवाओं और कंज्यूमेबल सामग्री की खरीदी में एक बड़े घोटाले का खुलासा हुआ है। सालाना 200 करोड़ रुपये की कंज्यूमेबल सामग्री की खरीदी में करीब 50 करोड़ रुपये के कमीशन के लेन-देन का आरोप है। हैरान करने वाली बात यह है कि इस पूरे खेल को अंजाम देने के लिए संविदा पर रखे गए कर्मचारियों को टेंडर की शर्तों को मनमाफिक तय करने की जिम्मेदारी दे दी गई है। आरोप है कि यह सब कुछ एक सोची-समझी रणनीति के तहत किया जा रहा है, ताकि चहेती कंपनियों को फायदा पहुंचाया जा सके और सरकार की छवि धूमिल हो। इस घोटाले में सबसे चौंकाने वाला नाम मोक्षित कॉर्पोरेशन का सामने आ रहा है, जिसके कर्ताधर्ताओं पर पहले ही कांग्रेस शासनकाल के दौरान लैब केमिकल और मशीन खरीदी में भारी अनियमितताओं के आरोप लग चुके हैं, बावजूद इसके उन्हें फिर से काम दिया जा रहा है।

नियमों को ताक पर रखकर 500% महंगे दामों पर खरीदी

सूत्रों के मुताबिक, सीजीएमएससी में नियम-कानूनों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। बाजार में जो कंज्यूमेबल सामग्री 200 रुपये में आसानी से उपलब्ध है, उसे 1000 रुपये में खरीदा जा रहा है। यानी सीधे तौर पर बाजार दर से पांच गुना ज्यादा कीमत चुकाई जा रही है। गुणवत्ताहीन सामग्रियों को ऊंचे दामों पर खरीदने के कारण हर साल होने वाली 200 करोड़ की खरीदी में से 100 करोड़ रुपये तक के भ्रष्टाचार का अंदेशा जताया जा रहा है। आरोप है कि टेंडर की शर्तें इस तरह से तैयार की जा रही हैं कि प्रतिस्पर्धा खत्म हो जाए और काम केवल चुनिंदा लोगों को ही मिले।

संविदा कर्मियों के सहारे चल रहा सिंडिकेट

शिकायतों के अनुसार, सीजीएमएससी में प्रोजेक्ट मैनेजमेंट यूनिट (PMU) के तहत 10 लोगों की नियम विरुद्ध तरीके से नियुक्ति की गई है। इन कर्मचारियों को हर महीने 2.5 लाख से लेकर 25 लाख रुपये तक का भारी-भरकम भुगतान किया जा रहा है। इनका मुख्य काम केवल इतना है कि ये सीजीएमएससी प्रबंधन के इशारे पर टेंडर के नियमों और शर्तों (RFP) में इस तरह के बदलाव करें कि ठेका सिर्फ उनके करीबियों को ही मिले।
आयुर्वेदिक अस्पतालों में दवा का टोटा, नियम 30% स्टॉक का
एक तरफ करोड़ों की खरीदी के दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ पिछले डेढ़ साल से आयुर्वेदिक दवाओं की खरीदी ही नहीं हुई है। सीजीएमएससी के नियमों के अनुसार, वेयरहाउस में कम से कम 30 फीसदी आपातकालीन (बफर) स्टॉक होना अनिवार्य है। लेकिन, वर्तमान में स्टॉक शून्य है। आयुष अस्पतालों में दवाओं के अभाव में मरीजों को मुफ्त मिलने वाली दवाइयां बाजार से खुद खरीदनी पड़ रही हैं।

बीजापुर डीएमएफ में भी उठे थे सवाल

सीजीएमएससी के वर्तमान प्रबंध संचालक (एमडी) रितेश कुमार अग्रवाल (2012 बैच के आईएएस) की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि अग्रवाल जब बीजापुर में दो साल तक कलेक्टर थे, तब भी डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन (DMF) और अन्य मदों में कई सौ करोड़ के काम बिना भौतिक सत्यापन के स्वीकृत किए गए थे। चूंकि बीजापुर नक्सल प्रभावित इलाका है, इसलिए अंदरूनी क्षेत्रों में हुए कामों की सही जांच नहीं हो पाई। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि अगर उन कार्यों की निष्पक्ष जांच हो, तो बड़े भ्रष्टाचार का पर्दाफाश हो सकता है।

अमित अग्रवाल की भूमिका सवालों के घेरे में...

मेडिकल कॉलेज और सीजीएमएससी में दवाइयों, अस्पताल की मशीनों, लैब टेस्ट किट और फर्नीचर की सप्लाई के नाम पर अमित अग्रवाल नामक व्यक्ति की सक्रियता चर्चा में है। आरोप है कि यह व्यक्ति टेंडर दिलाने के नाम पर बड़े पैमाने पर कमीशन की वसूली कर रहा है। यह व्यक्ति कौन है और इसे किसका संरक्षण प्राप्त है, यह जांच का विषय बना हुआ है।

हितेश साहू फिर अहम जिम्मेदारी में:

मोक्षित कॉर्पोरेशन से जुड़े हितेश साहू पर कांग्रेस सरकार के समय लैब केमिकल और उपकरणों की खरीदी में करोड़ों के घोटाले का आरोप है। हैरानी की बात यह है कि ईओडब्ल्यू और ईडी की जांच के दायरे में आने वाले इस व्यक्ति को अब फिर से कंज्यूमेबल आइटम्स की खरीदी की प्रक्रिया में अहम भूमिका दे दी गई है।

मंत्री-सचिव की भी नहीं सुन रहे अधिकारी....

विभाग के इंटरनल सूत्रों का कहना है कि सीजीएमएससी के एमडी रितेश अग्रवाल विभागीय मंत्री और स्वास्थ्य सचिव के निर्देशों को भी दरकिनार कर रहे हैं। मनमानी कार्यप्रणाली और अपने अधीनस्थ अधिकारियों-कर्मचारियों के साथ दुर्व्यवहार की लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।
 शासन स्तर पर लगातार हो रही शिकायतों और मीडिया रिपोर्ट्स के बाद अब ईओडब्ल्यू (EOW) या किसी स्वतंत्र एजेंसी से पूरे मामले की विस्तृत जांच की मांग तेज हो गई है। अगर पीएमयू में हुई नियुक्तियों और पिछले कुछ महीनों में जारी टेंडरों की फाइलों को खंगाला जाए, तो कई चौंकाने वाले नाम सामने आ सकते हैं।