बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में ऐसा फैसला सुनाया है, जो भविष्य में कई परिवारों के लिए मिसाल बन सकता है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी बेटी का विवाह हो जाने मात्र से उसका मायके से संबंध समाप्त नहीं हो जाता, इसलिए केवल विवाहित होने के आधार पर उसे अनुकंपा नियुक्ति के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने इस मामले में राज्य शासन के उस आदेश को भी निरस्त कर दिया, जिसके आधार पर विवाहित बेटी को अनुकंपा नियुक्ति देने से इनकार किया गया था। अदालत ने संबंधित विभाग को निर्देश दिया है कि वह पूरे मामले पर नए सिरे से विचार कर चार सप्ताह के भीतर कानून के अनुरूप फैसला ले।

शासन के आदेश पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की एकलपीठ ने पाया कि शासन ने केवल वैवाहिक स्थिति को आधार बनाकर आवेदन अस्वीकार कर दिया था। अदालत ने कहा कि ऐसा दृष्टिकोण संविधान में निहित समानता के अधिकार और सामाजिक न्याय की भावना के अनुरूप नहीं है। कोर्ट ने माना कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य मृत सरकारी कर्मचारी के आश्रित परिवार को आर्थिक संबल देना है। ऐसे में केवल इस आधार पर कि बेटी का विवाह हो चुका है, उसे इस अधिकार से वंचित करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।

'विवाह से जिम्मेदारियां खत्म नहीं होतीं'
अपने फैसले में अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि विवाह किसी बेटी के मायके के प्रति उसके संबंध, दायित्व या पारिवारिक जिम्मेदारियों को समाप्त नहीं करता। यदि किसी मृत सरकारी कर्मचारी के परिवार की परिस्थितियां अनुकंपा नियुक्ति के लिए पात्र हैं और विवाहित बेटी वास्तव में आश्रित या पात्र है, तो उसे केवल शादीशुदा होने के कारण अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता।

विवाहित बहन भी हो सकती है पात्र
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह सिद्धांत केवल विवाहित बेटियों तक सीमित नहीं है। यदि कानून और परिस्थितियां अनुमति देती हैं, तो विवाहित बहन को भी केवल उसकी वैवाहिक स्थिति के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि प्रत्येक मामले का निर्णय उसके तथ्यों और पात्रता के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल वैवाहिक स्थिति को आधार बनाकर।

चार सप्ताह में नए सिरे से फैसला लेने का आदेश
हाईकोर्ट ने संबंधित प्राधिकरण को निर्देश दिया है कि वह न्यायालय की टिप्पणियों और लागू नियमों को ध्यान में रखते हुए पूरे मामले की दोबारा समीक्षा करे और चार सप्ताह के भीतर नया निर्णय पारित करे।

क्यों अहम है यह फैसला?
कानूनी जानकारों के अनुसार यह निर्णय अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण नज़ीर साबित हो सकता है। लंबे समय से कई विवाहित बेटियों के आवेदन केवल शादीशुदा होने के आधार पर खारिज किए जाते रहे हैं। हाईकोर्ट के इस फैसले से ऐसे मामलों में समानता और न्याय के सिद्धांतों को और मजबूती मिलने की उम्मीद है। यदि भविष्य में भी किसी पात्र विवाहित बेटी या बहन को केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति से वंचित किया जाता है, तो यह फैसला ऐसे मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी आधार बन सकता है।