रायपुर | महिला एवं बाल विकास विभाग में प्रशासनिक नियमों को दरकिनार कर मनमानी करने का मामला सामने आया है। सावन महीने में आयोजित विभागीय समीक्षा बैठक में महिला मंत्री मौजूद नहीं थीं, इसके बावजूद उनके ओएसडी प्रतीक खरे ने खुद ही बड़े अधिकारियों की बैठक ले ली। इस घटना के बाद से मंत्रालय के प्रशासनिक हल्कों में चर्चा तेज हो गई है कि मंत्री की गैर-हाजिरी में आखिर एक ओएसडी अपने ही सीनियर अधिकारियों की बैठक कैसे ले सकता है?

क्या जूनियर को बॉस बनाने की चल रही तैयारी....

विभाग सूत्रों से जो जानकारी मिली है उनके मुताबिक सीनियर अधिकारियों के रहते हुए जूनियर से बैठक दिलवाने और उन्हें बड़े दायित्व सौंपने के पीछे बड़ा खेल चल रहा है। चर्चा है कि जूनियर अफसरों को प्रमोट कर संयुक्त संचालक बनाने की ग्राउंडिंग की जा रही है। वरिष्ठ अफसरों को दरकिनार करके जूनियर को बॉस बनाने की इस कार्यप्रणाली से पूरे विभाग में नाराजगी है। विभागीय कर्मचारियों के अलावा इस मनमानी को लेकर भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के लोगों में भी भारी रोष देखा जा रहा है। सत्ताधारी दल और संगठन के लोग भी ब्यूरोक्रेसी के इस रवैये से खफा हैं कि सीनियर अधिकारियों के ऊपर जूनियर को क्यों थोपा जा रहा है।

किसकी अनुमति से हुई बैठक, उठ रही जांच की मांग

बिना मंत्री की उपस्थिति के इस तरह की बैठक होने से पूरे प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली पर उंगलियां उठ रही है। सवाल है कि क्या यह बैठक मंत्री की अनुमति से ली गई? क्या विभाग के सचिव ने ओएसडी को अपने से सीनियर अधिकारियों की बैठक लेने की छूट दी थी? बिना किसी सक्षम अधिकारी की अनुमति के कोई ओएसडी अपने से बड़े अधिकारियों की क्लास नहीं ले सकता। अगर सचिव या मंत्री ने इसकी अनुमति नहीं दी थी, तो ओएसडी ने यह बैठक कैसे ली? यह पूरी तरह से जांच का विषय है और अब इस मामले में जांच की मांग उठ रही है।

पहले कुशवाहा ने भी की थी यही गलती, गंवानी पड़ी थी कुर्सी

महिला एवं बाल विकास विभाग में वरिष्ठ अधिकारियों की अनदेखी और मर्यादा लांघने का यह पहला मामला नहीं है। विभागीय जानकारों के मुताबिक, ठीक यही गलती सालों पहले रामजतन कुशवाहा ने की थी। कुशवाहा विभाग के चर्चित सेवानिवृत्त उप संचालक रहे हैं, जो अपने पूरे सेवाकाल में कर्मचारियों-अधिकारियों को प्रताड़ित करने और उनकी पदोन्नति बाधित करने के लिए बदनाम रहे।बात वर्ष 2003-2004 की है। उस वक्त कुशवाहा तत्कालीन महिला बाल विकास मंत्री श्रीमती रेणुका सिंह के निज सचिव का दायित्व निभा रहे थे। उन्होंने भी अपने बुलंद हौसलों के चलते मंत्री की गैर-मौजूदगी में मंत्री की तरफ से (behalf) खुद ही मंत्री बनकर कांकेर में एक जिला स्तरीय विभागीय समीक्षा बैठक ले ली थी। प्रशासनिक मर्यादा लांघने और बड़े अधिकारियों को नजरअंदाज करने के इस दुस्साहस की उच्च स्तरीय शिकायत सीधे तत्कालीन राज्यपाल महोदय से की गई थी। शिकायत पर तत्काल कार्रवाई हुई और कुशवाहा की निज सचिव पद से तुरंत छुट्टी कर दी गई। पद से हटाए जाने के इस अपमान की टीस उनके पूरे प्रशासनिक सेवा काल में प्रताड़ना के रूप में उनकी कार्यशैली में नजर आती रही। अब सालों बाद, उसी विभाग में फिर से ठीक वैसी ही गलती दोहराई जा रही है।