बिलासपुर.सीपत थाना क्षेत्र में 1200 रुपए कीमत की 6 लीटर महुआ शराब के साथ गिरफ्तार किए गए 34 वर्षीय श्रवण सूर्यवंशी की पुलिस कस्टडी में हुई मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने राज्य सरकार तथा पुलिस प्रशासन के रवैये पर गहरी नाराजगी जताते हुए पूरे प्रकरण की जांच सीबीआई को सौंप दी है। अदालत ने हाई कोर्ट द्वारा पूर्व में तय की गई 1 लाख रुपए की मुआवजा राशि को कम मानते हुए, राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि मृतक की पत्नी को चार सप्ताह के भीतर 25 लाख रुपए का अंतरिम मुआवजा प्रदान किया जाए। प्रकरण की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर 2026 को निर्धारित की गई है। इस तिथि पर सीबीआई को अपनी स्टेटस रिपोर्ट अदालत के पटल पर रखनी होगी।

घटनाक्रम के अनुसार, 18 जनवरी 2024 को सीपत थाने में पदस्थ हेड कांस्टेबल उमाशंकर राठौर ने श्रवण को रोककर उसकी तलाशी ली थी। पुलिस के मुताबिक, उसके पास से दो-दो लीटर की तीन बोतलों में कच्ची शराब मिली थी। आबकारी अधिनियम की धारा 34(2) के अंतर्गत गिरफ्तारी के बाद रिमांड प्रक्रिया पूरी कर युवक को बिलासपुर सेंट्रल जेल दाखिल कर दिया गया। 21 जनवरी को जेल में तबीयत खराब होने की बात कहकर उसे सिम्स अस्पताल भेजा गया। अगले ही दिन 22 जनवरी 2024 की सुबह करीब 6 बजे उसकी जान चली गई।

शुरुआती दौर में जेल और सिम्स प्रशासन की तरफ से जो रिपोर्ट तैयार की गई, उसमें मौत की वजह शराब छोड़ने के कारण उत्पन्न लक्षण और फेफड़ों की दिक्कत बताई गई। मृतक के शरीर पर किसी भी तरह की बाहरी चोट होने से इनकार कर दिया गया। मामला कस्टोडियल डेथ का होने के चलते बिलासपुर जिला एवं सत्र न्यायाधीश के निर्देश पर प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा जांच शुरू की गई। न्यायिक मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में हुए पोस्टमॉर्टम में असलियत सामने आई। रिपोर्ट में दर्ज हुआ कि मृतक के सिर के पिछले हिस्से में गहरा घाव था, जहां से लगातार रक्तस्राव हो रहा था। शरीर के अंदरूनी हिस्सों में भी ब्लीडिंग, दाईं कलाई पर सूजन के साथ जांघ और गर्दन के पीछे गंभीर चोट के निशान पाए गए। इन तथ्यों से यह स्थापित हो गया कि कस्टडी के दौरान हुई मारपीट उसकी मौत का कारण बनी।

न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 22 जुलाई 2024 को दी गई अपनी विस्तृत रिपोर्ट में यह पुष्ट कर दिया था कि मौत सिर में लगी चोट के कारण हुई है। इसके बावजूद राज्य पुलिस ने जिम्मेदार लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने में कोताही बरती। न्याय के लिए मृतक की पत्नी लहरा बाई और उसकी बेटियों ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की। 3 अक्टूबर 2024 को हाई कोर्ट ने कस्टोडियल हिंसा की बात तो मानी, लेकिन मुआवजे के रूप में केवल 1 लाख रुपए देने का निर्देश दिया। इस फैसले को अंततः सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।

बीती 4 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष छत्तीसगढ़ के डीजीपी, डीजी जेल और प्रमुख सचिव (गृह) वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित हुए। अदालत ने जब पूछा कि न्यायिक रिपोर्ट आने के बाद भी एफआईआर दर्ज क्यों नहीं की गई, तो डीजीपी का तर्क था कि उन्हें जांच रिपोर्ट आधिकारिक रूप से प्राप्त नहीं हुई थी। इस दलील पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई। अदालत ने टिप्पणी की कि जब राज्य सरकार ने हाई कोर्ट में स्वयं स्वीकार किया था कि जांच चल रही है, तो अब ऐसा तर्क प्रस्तुत करना अदालत की आंखों में धूल झोंकने के समान है।