
बिलासपुर। बिलासपुर स्थित प्रतिष्ठित गुरु घासीदास सेंट्रल यूनिवर्सिटी (GGU) के एनएसएस (NSS) कैंप में छात्रों को जबरन नमाज पढ़ाने के मामले में आरोपी प्रोफेसर को अदालत से कोई राहत नहीं मिली है। हाईकोर्ट ने मामले में नामजद आरोपी प्रोफेसर दिलीप झा की उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर (FIR) और आपराधिक कार्यवाही को निरस्त करने की गुहार लगाई थी। अदालत के इस सख्त रुख के बाद अब साफ हो गया है कि मामले की सच्चाई का फैसला ट्रायल कोर्ट में ही होगा।
क्या है जबरन नमाज पढ़ाने का पूरा विवाद?
यह पूरा मामला इसी साल मार्च महीने का है, जब गुरु घासीदास सेंट्रल यूनिवर्सिटी के तत्वावधान में राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) का सात दिवसीय विशेष कैंप आयोजित किया गया था। पुलिस में दर्ज शिकायत और आरोपों के मुताबिक, कैंप के दौरान ईद के मौके पर एक विवादित फरमान जारी किया गया। आरोप है कि पहले मुस्लिम छात्रों को स्टेज पर नमाज अदा करने की अनुमति दी गई, लेकिन हद तब पार हो गई जब वहां मौजूद गैर-मुस्लिम छात्रों को भी कथित तौर पर नमाज पढ़ने के लिए मजबूर किया गया।
शिकायत में यह गंभीर आरोप भी लगाया गया कि जब कुछ छात्रों ने इस धार्मिक कृत्य का विरोध किया, तो उन पर भारी दबाव बनाया गया। छात्रों को धमकी दी गई कि अगर वे बात नहीं मानेंगे तो उनका एनएसएस प्रमाण पत्र (Certificate) रद्द कर दिया जाएगा। मामले के तूल पकड़ने के बाद पुलिस ने शुरुआती जांच की और उस समय प्रोग्राम के कोऑर्डिनेटर की जिम्मेदारी संभाल रहे प्रोफेसर दिलीप झा के खिलाफ एफआईआर दर्ज की। विस्तृत जांच के बाद पुलिस ने कोर्ट में चार्जशीट भी दाखिल कर दी है।
प्रोफेसर की दलील: 'मैं तो मौके पर मौजूद ही नहीं था'
अपने बचाव में प्रोफेसर दिलीप झा ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने अपनी याचिका में दलील दी कि जिस कथित घटना का जिक्र किया जा रहा है, उससे उनका कोई सीधा संबंध नहीं है। उन्होंने कोर्ट के सामने तर्क रखा कि घटना के वक्त वे कैंप में उस स्थान पर मौजूद भी नहीं थे। झा का कहना था कि यह पूरी तरह से कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है और उन्हें बिना किसी ठोस आधार के फंसाया गया है।
सरकार का कड़ा विरोध
याचिकाकर्ता की इन दलीलों का राज्य सरकार ने पुरजोर विरोध किया। शासन की ओर से पैरवी करते हुए कहा गया कि पुलिस ने अपनी जांच पूरी कर ली है। यह मामला सीधे तौर पर तथ्यों और सबूतों के विवाद से जुड़ा है, जिसका सही मूल्यांकन केवल ट्रायल के दौरान गवाहों के बयानों और जिरह से ही मुमकिन है। इसलिए बीच में एफआईआर रद्द नहीं की जा सकती।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी: ट्रायल का सामना करना होगा
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने दोनों पक्षों को विस्तार से सुनने के बाद अपना अहम फैसला सुनाया। बेंच ने कहा कि पुलिस द्वारा पेश किए गए आरोप पत्र (Charge Sheet) में प्रथम दृष्टया (Prima Facie) ऐसे पर्याप्त सबूत मौजूद हैं, जो मामले के ट्रायल को जरूरी बनाते हैं। कोर्ट ने साफ किया कि जब जांच पूरी हो चुकी है और सबूत जुटाए जा चुके हैं, तो ऐसे में यह नहीं माना जा सकता कि मामला बदनियती (Malafide Intention) से दर्ज किया गया है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के उस स्थापित सिद्धांत का भी प्रमुखता से जिक्र किया, जिसके अनुसार किसी भी एफआईआर को केवल बहुत ही 'असाधारण परिस्थितियों' में ही रद्द किया जा सकता है। अदालत ने कहा कि अगर आरोपी प्रोफेसर अपनी भूमिका या गैर-मौजूदगी साबित करना चाहते हैं, तो उन्हें ट्रायल के दौरान सबूत पेश करने होंगे। शुरुआती स्तर पर अदालत ऐसे मामलों में दखल नहीं दे सकती। इस फैसले के साथ ही प्रोफेसर की याचिका खारिज कर दी गई।

