जगदलपुर। बस्तर की 47 साल पुरानी बोधघाट परियोजना का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर आ गया है। राज्य सरकार ने जैसे ही प्रोजेक्ट को लेकर दोबारा सर्वे शुरू कराने की सुगबुगाहट तेज की, बस्तर के आदिवासियों का गुस्सा फूट पड़ा है। रविवार को दंतेवाड़ा के उसी हितालकूडूम गांव में हजारों की भीड़ जुटी, जहां 1979 में कांग्रेस ने इस प्रोजेक्ट की नींव डाली थी। 18 पंचायतों और 56 गांवों के ग्रामीणों ने महाबैठक कर सरकार को सीधा और कड़ा अल्टीमेटम दे दिया है- "पहले हमारे सीने को गोलियों से छलनी करो, उसके बाद ही बोधघाट डैम बनाना।

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आस्था पर मंडराता डूब का खतरा

इस आंदोलन के केंद्र में सिर्फ विस्थापन का डर नहीं है, बल्कि आदिवासियों की गहरी आस्था है। महाबैठक में एक ही आवाज गूंजी कि सरकार लोगों को तो विस्थापित कर देगी, लेकिन हमारे देवी-देवताओं का विस्थापन कैसे करेगी? आदिवासी इलाके के पेड़-पहाड़ों और गुफाओं को अपना पितर समझते हैं। वे देवी-देवता मानकर उनकी पूजा करते हैं। आदिवासियों का कहना है कि बोधघाट डैम बना तो उनकी आस्था से जुड़ी ये तमाम जगहें पानी में डूब जाएंगी। इस नुकसान की भरपाई दुनिया के किसी भी मुआवजे से कतई संभव नहीं है। उनका साफ मानना है कि बोधघाट डैम बनने से आधा बस्तर ही खत्म हो जाएगा और विकास की आड़ में वे अपनी पुश्तैनी जमीन से बेदखली बर्दाश्त नहीं करेंगे।

 

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सियासी अखाड़ा बना हितालकूडूम, सत्ता पक्ष गायब

बोधघाट के इस विरोध ने अब बड़ा राजनीतिक रूप ले लिया है। संघर्ष समिति ने बैठक में बस्तर के तमाम नेताओं को बुलाया था, लेकिन सत्ता पक्ष (भाजपा) ने इस महाबैठक से पूरी तरह दूरी बनाए रखी। उनका कोई नेता वहां नहीं पहुंचा। दूसरी तरफ, विपक्ष ने इस मुद्दे को पूरी तरह लपक लिया है। बैठक में बीजापुर विधायक विक्रम मंडावी, पूर्व विधायक राजमन बेंजाम, रेखचंद जैन, देवती कर्मा, छविंद्र कर्मा और चंदन कश्यप जैसे दिग्गज कांग्रेसी पहुंचे।

कांग्रेस का खुला समर्थन, ग्रामीणों की दो टूक चेतावनी

कांग्रेस विधायक विक्रम मंडावी ने मंच से ऐलान किया कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने भी इस आंदोलन को अपना समर्थन पत्र भेजा है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि कांग्रेस प्रभावित ग्रामीणों के साथ खड़ी है और इस लड़ाई को गांव से लेकर रायपुर और दिल्ली तक ले जाया जाएगा। ग्रामीणों ने भी एक स्वर में सवाल उठाया कि 47 साल के लगातार विरोध के बाद भी सरकार इसे बनाने पर क्यों आमादा है? ग्रामीणों ने साफ चेतावनी दी है कि जो राजनीतिक पार्टियां उनकी संस्कृति, जल-जंगल-जमीन और अस्तित्व की इस लड़ाई में उनके साथ नहीं हैं, चुनाव में आदिवासी भी उनका साथ कभी नहीं देंगे।

सरकार के दावों और आदिवासियों के विरोध में टकराव

एक ओर सरकार का यह दावा है कि बोधघाट बहुउद्देशीय परियोजना से पूरे बस्तर में सिंचाई और विकास को नई गति मिलेगी। वहीं दूसरी ओर, दंतेवाड़ा, बीजापुर, बस्तर और नारायणपुर जिलों के 56 प्रभावित गांवों में सर्वे की चर्चा मात्र से ही विरोध की गतिविधियां बेहद तेज हो गई हैं। 47 साल से अटका यह प्रोजेक्ट अब सरकार के लिए एक बड़ी राजनीतिक और प्रशासनिक चुनौती बन गया है।