रायपुर। छत्तीसगढ़ के दिव्यांग कल्याण और पुनर्वास से जुड़ी संस्थाओं में कथित वित्तीय अनियमितताओं के मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की जांच पूरी होने की बात सामने आई है। शुरुआती दौर में इस मामले में करीब 1,000 करोड़ रुपये की कथित वित्तीय गड़बड़ी के आरोप लगाए गए थे। हालांकि, अब जांच से जुड़े सूत्रों के हवाले से सामने आ रही जानकारी के मुताबिक, वर्ष 2004 से 2018 के बीच संबंधित संस्थाओं का वास्तविक खर्च करीब 35 से 40 करोड़ रुपये के आसपास पाया गया है। अब इस मामले में सीबीआई की संभावित चार्जशीट पर सबकी नजर है। आरोप पत्र दाखिल होने के बाद ही स्पष्ट होगा कि जांच एजेंसी ने किन लोगों की भूमिका को आपराधिक स्तर पर जिम्मेदार माना है और कितनी वित्तीय अनियमितताओं को साक्ष्यों के आधार पर स्थापित किया गया है।

SRC और PRRC से जुड़ा है पूरा मामला
जांच का केंद्र समाज कल्याण विभाग से जुड़ा State Resource Centre (SRC) और उसके अंतर्गत संचालित Physical Referral Rehabilitation Centre (PRRC) रहा है। इन संस्थाओं के संचालन, कर्मचारियों की नियुक्ति, वेतन भुगतान और सरकारी राशि के इस्तेमाल को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में भी इस मामले में सरकारी धन के कथित दुरुपयोग और कर्मचारियों के नाम पर वेतन निकासी जैसे आरोपों का उल्लेख है। हाईकोर्ट ने जनवरी 2020 में CBI को FIR दर्ज कर जांच करने का निर्देश दिया था।

करीब 30 अधिकारी-कर्मचारियों से पूछताछ की चर्चा
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जांच के दौरान CBI ने समाज कल्याण विभाग और संबंधित संस्थाओं से जुड़े करीब 30 अधिकारी-कर्मचारियों से पूछताछ की। जांच का एक प्रमुख पहलू ऐसे कर्मचारियों की नियुक्ति और उनके नाम पर किए गए वेतन भुगतान से जुड़ा रहा, जिनकी वास्तविक उपस्थिति और कार्य को लेकर सवाल उठाए गए थे। CBI ने मामले से जुड़े दस्तावेजों और वित्तीय रिकॉर्ड की भी जांच की। पहले की कार्रवाई में माना स्थित SRC और PRRC से जुड़े रिकॉर्ड भी जांच एजेंसी के कब्जे में लिए गए थे।

1000 करोड़ का आरोप कैसे सामने आया?
इस मामले की शुरुआत में अलग-अलग वर्षों और जिलों के लिए जारी राशि तथा कथित अनियमितताओं को जोड़कर करीब 1,000 करोड़ रुपये से अधिक की संभावित हेराफेरी का आरोप सामने आया था। हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में भी याचिकाकर्ता की ओर से इसी स्तर की संभावित राशि के दावे का उल्लेख मिलता है। हालांकि, यह आंकड़ा शुरुआत में लगाए गए आरोपों और अनुमान पर आधारित था। मौजूदा जांच में सामने आए कथित वास्तविक खर्च का आंकड़ा इससे काफी अलग बताया जा रहा है। इसलिए अंतिम वित्तीय नुकसान या आपराधिक जिम्मेदारी का निर्धारण CBI की जांच और अदालत में पेश किए जाने वाले साक्ष्यों से ही होगा।

हाईकोर्ट के निर्देश के बाद CBI तक पहुंचा मामला
रायपुर निवासी कुंदन सिंह ठाकुर की याचिका के बाद यह मामला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट पहुंचा था। याचिका में आरोप लगाया गया था कि PRRC में कर्मचारियों के नाम पर वेतन और अन्य मदों में सरकारी राशि निकाली गई, जबकि संस्थान की वास्तविक गतिविधियों और नियुक्तियों को लेकर गंभीर सवाल थे। हाईकोर्ट ने मामले को गंभीर मानते हुए CBI जांच के निर्देश दिए थे। इसके बाद CBI ने फरवरी 2020 में FIR दर्ज की। FIR में आपराधिक षड्यंत्र, आपराधिक विश्वासघात, धोखाधड़ी, जालसाजी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराएं शामिल की गई थीं।

कई वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में
मामले में कई पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका को लेकर आरोप लगाए गए थे। हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में विवेक ढांड, एमके राउत, आलोक शुक्ला, सुनील कुजूर, बीएल अग्रवाल, सतीश पांडेय और पीपी श्रोती समेत कई नामों का उल्लेख हुआ है। हालांकि, किसी व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी तय होना केवल जांच में नाम आने से साबित नहीं होता; इसके लिए CBI के साक्ष्य और न्यायिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।

अब चार्जशीट से साफ होगी जांच की पूरी तस्वीर
CBI जांच पूरी होने की खबर के बाद अब सबसे बड़ा सवाल संभावित चार्जशीट को लेकर है। आरोप पत्र में किन लोगों को आरोपी बनाया जाता है, किन वित्तीय लेन-देन को संदिग्ध माना जाता है और शुरुआती 1,000 करोड़ रुपये के आरोपों में से कितनी राशि को जांच एजेंसी प्रमाणित कर पाती है, इन सवालों का जवाब चार्जशीट के बाद ही सामने आएगा। फिलहाल, मामले में अंतिम निष्कर्ष और आरोपों की कानूनी पुष्टि अदालत की प्रक्रिया के बाद ही मानी जाएगी।