
रायपुर। छत्तीसगढ़ में सरकारी अस्पतालों तक दवाइयां पहुंचाने की जिम्मेदारी संभालने वाले छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉरपोरेशन लिमिटेड (CGMSC) की कार्यप्रणाली एक बार फिर चर्चा में आ गई है। प्रदेश के नागरिकों को चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के लिए की जाने वाली दवा खरीदी की प्रक्रिया विवादों में घिरती दिख रही है। नई निविदा (टेंडर) प्रक्रिया शुरू होने और उसके अंतिम चरण में पहुंचने के बावजूद, पुरानी कंपनियों के रेट कॉन्ट्रैक्ट को आगे बढ़ाने की तैयारी की जा रही है। इससे पूरी निविदा प्रणाली की पारदर्शिता पर संदेह उत्पन्न हो गया है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, आयुर्वेदिक दवाओं की खरीदी के लिए विभाग ने 22 जून को चार नए टेंडर जारी किए थे। इन टेंडरों में आवेदन करने की आखिरी तारीख 14 जुलाई निर्धारित की गई थी, जो अब बीत चुकी है। विभागीय सूत्रों का कहना है कि टेंडर का पहला चरण खोला जा चुका है। इसके साथ ही दावा-आपत्ति मंगाने और उनके निराकरण की प्रक्रिया भी पूरी की जा चुकी है। जब नई खरीदी प्रक्रिया लगभग अंतिम दौर में है, तब 7 अगस्त को विभाग की तरफ से एक नया आदेश जारी किया गया है। इस आदेश के माध्यम से कुछ चुनिंदा पुरानी कंपनियों से पुराने करार को आगे बढ़ाने के संबंध में सहमति और सुझाव मांगे गए हैं। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि इस कदम से खुली प्रतिस्पर्धा पर असर पड़ेगा और कुछ विशेष कंपनियों को अनुचित लाभ मिलने की आशंका है।
विभागीय कार्यप्रणाली से परिचित लोगों का कहना है कि यह कोई नया तरीका नहीं है। पूर्व में 20 नवंबर को भी आयुर्वेदिक दवाओं की आपूर्ति के लिए टेंडर निकाले गए थे। उन टेंडरों की प्रक्रिया को लंबे समय तक पूरा नहीं किया गया। उस दौरान भी पुराने रेट कॉन्ट्रैक्ट को छह महीने के लिए बढ़ा दिया गया था और उन्हीं पुरानी कंपनियों से सप्लाई ली जाती रही।
इस पूरी कवायद के पीछे कमीशन के खेल का आरोप लग रहा है। कहा जा रहा है कि लगभग 60 फीसदी तक के कमीशन के लिए एलोपैथिक और आयुर्वेदिक, दोनों प्रकार की दवाओं की गुणवत्ता को ताक पर रखा जा रहा है। DLL सहित कई अन्य फर्मों पर विभागीय अधिकारियों की विशेष कृपा होने की चर्चा जोरों पर है। दवाइयों की गुणवत्ता प्रभावित होने से प्रदेश भर के हजारों मरीजों के स्वास्थ्य को खतरा हो सकता है। नौकरशाही के शीर्ष पदों पर बैठे अधिकारी इस पूरी प्रक्रिया को जानते हुए भी खामोश बैठे हैं, जिससे उनकी भूमिका भी संदेह के घेरे में आ गई है। स्वास्थ्य सचिव स्तर के अधिकारियों के कार्य करने के तरीके को लेकर भी उच्च स्तरीय जांच की मांग होने लगी है। विभाग में अनियमितताओं की बात कहते हुए सीबीआई और ईडी जैसी एजेंसियों से जांच कराने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
वहीं, इन सभी आरोपों के बीच CGMSC के प्रबंध संचालक रितेश अग्रवाल ने स्थिति स्पष्ट की है। उन्होंने पुरानी कंपनियों के करार को फिर से बढ़ाने की बातों का खंडन किया है। उनके अनुसार, पुराने रेट कॉन्ट्रैक्ट को विस्तार देने की कोई भी योजना नहीं है। नई टेंडर प्रक्रिया को ही अंतिम रूप दिया जाएगा और उसी के आधार पर भविष्य में आयुर्वेदिक दवाओं की खरीदी की जाएगी।