रायपुर। छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने की दिशा में तैयारियां तेज हो गई हैं। राज्य सरकार द्वारा गठित पांच सदस्यीय समिति अपनी रिपोर्ट 30 नवंबर तक सरकार को सौंप सकती है। इसके बाद दिसंबर में विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान UCC का ड्राफ्ट पेश किए जाने की संभावना है। प्रस्तावित कानून में विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर कई अहम प्रावधान शामिल किए जा सकते हैं।

सबसे ज्यादा चर्चा लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े प्रस्तावित नियमों को लेकर हो रही है। इसके तहत लिव-इन में रहने वाले जोड़ों के लिए रजिस्ट्रार के पास अपने रिश्ते का पंजीकरण कराना अनिवार्य किया जा सकता है। इतना ही नहीं, अगर दोनों में से कोई एक पार्टनर रिश्ता खत्म करना चाहता है, तो इसकी सूचना भी संबंधित रजिस्ट्रार को देनी पड़ सकती है।

लिव-इन रिलेशनशिप का कराना पड़ सकता है रजिस्ट्रेशन

प्रस्तावित UCC ड्राफ्ट में लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी रिकॉर्ड में दर्ज करने की व्यवस्था शामिल हो सकती है। इसके तहत साथ रहने का फैसला करने वाले जोड़ों को संबंधित रजिस्ट्रार के पास पंजीकरण कराना पड़ सकता है।

यदि दोनों में से कोई एक पार्टनर साथ रहना जारी नहीं रखना चाहता, तो उसे रिश्ता खत्म करने की जानकारी भी रजिस्ट्रार को देनी होगी। प्रस्ताव में इस सूचना की एक कॉपी दूसरे पार्टनर को भेजने का प्रावधान भी शामिल किया जा सकता है।

नियमों का उल्लंघन करने पर जुर्माना और जेल जैसी सजा का प्रावधान रखने पर भी विचार किया जा रहा है। हालांकि, इन नियमों को लेकर अभी अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।

रिश्ता टूटने पर महिला को मिल सकता है गुजारा भत्ता

प्रस्तावित UCC में लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं के आर्थिक अधिकारों को भी महत्व दिया जा सकता है। अगर रिश्ता खत्म होता है, तो महिला साथी को गुजारा भत्ता देने की व्यवस्था प्रस्तावित है।

इसके लिए महिला न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में आवेदन कर सकेगी। इसका उद्देश्य लिव-इन रिलेशनशिप समाप्त होने के बाद महिला को आर्थिक सुरक्षा उपलब्ध कराना है।

लिव-इन से जन्मे बच्चों को मिलेगा संपत्ति में अधिकार

प्रस्तावित व्यवस्था में लिव-इन रिलेशनशिप से जन्म लेने वाले बच्चों को वैध संतान का दर्जा देने की बात कही गई है। इसके साथ ही ऐसे बच्चों को पिता की पैतृक संपत्ति में समान अधिकार देने का प्रस्ताव भी शामिल हो सकता है।

इसका उद्देश्य माता-पिता के अलग होने की स्थिति में बच्चों के कानूनी और संपत्ति संबंधी अधिकारों की सुरक्षा करना है।

विवाह और तलाक के लिए भी लागू हो सकता है समान कानून

UCC समिति को विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार और दत्तक ग्रहण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर भी सुझाव मिले हैं। प्रस्तावित व्यवस्था में सभी धर्मों के लोगों के लिए विवाह पंजीकरण अनिवार्य करने पर विचार किया जा रहा है।

इसके अलावा तलाक की प्रक्रिया को लेकर भी समान कानून बनाने का प्रस्ताव है। इससे अलग-अलग धर्मों में विवाह और तलाक से जुड़े मौजूदा कानूनी प्रावधानों में बदलाव हो सकता है।

आदिवासी परंपराओं को सुरक्षित रखना होगी बड़ी चुनौती

छत्तीसगढ़ में UCC को लेकर आदिवासी समाज की ओर से भी असहमति सामने आई है। खासकर बस्तर और सरगुजा संभाग में आदिवासी समुदायों ने चिंता जताई है कि समान नागरिक संहिता लागू होने से उनकी पारंपरिक रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक पहचान पर असर पड़ सकता है।

ऐसे में समिति के सामने आदिवासी समाज की परंपराओं और संवैधानिक अधिकारों को सुरक्षित रखने की चुनौती होगी। समिति इस विषय पर मिले सुझावों और कानूनी पहलुओं का अध्ययन कर रही है।

जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में बनी है समिति

छत्तीसगढ़ सरकार ने जून 2026 में समान नागरिक संहिता के लिए पांच सदस्यीय समिति का गठन किया था। इसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई कर रही हैं।

समिति ने आम नागरिकों, सामाजिक संगठनों, धार्मिक संस्थाओं, राजनीतिक दलों और विभिन्न समुदायों से सुझाव और आपत्तियां मांगी थीं। इसके लिए ई-मेल, वेबसाइट, डाक और सीधे संपर्क के माध्यम से राय देने का अवसर दिया गया था।

समिति को एक हजार से अधिक सुझाव मिले हैं। ऑनलाइन सुझाव और आपत्तियां जमा करने की अंतिम तारीख 30 अक्टूबर थी। अब समिति इन सुझावों के साथ मौजूदा कानूनों का अध्ययन कर रही है।

30 नवंबर तक रिपोर्ट, दिसंबर में विधानसभा में पेश हो सकता है ड्राफ्ट

UCC समिति रायपुर, दुर्ग, अंबिकापुर और सूरजपुर सहित बस्तर संभाग के तीन जिलों में बैठकें कर चुकी है। इन बैठकों में आम लोगों और विभिन्न संगठनों से राय ली गई।

तय कार्यक्रम के अनुसार, समिति 30 नवंबर तक अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंप सकती है। इसके बाद दिसंबर में विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान UCC का ड्राफ्ट पेश किए जाने की संभावना है।

फिलहाल लिव-इन रजिस्ट्रेशन, गुजारा भत्ता, बच्चों के संपत्ति अधिकार और विवाह पंजीकरण से जुड़े सभी प्रावधान प्रस्तावित हैं। इन्हें अंतिम कानून नहीं माना जा सकता। समिति की रिपोर्ट और राज्य सरकार के फैसले के बाद ही स्पष्ट होगा कि छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता का अंतिम स्वरूप क्या होगा।