रायपुर/नई दिल्ली। देश की सत्ता का इतिहास कुर्सी की खींचतान और निजी हठधर्मिता से भरा पड़ा है। जब भी कुर्सी की लालसा देश की भलाई से आगे निकल जाती है, तो कायदे-कानून और लोकतांत्रिक ढांचे की धज्जियां उड़ने लगती हैं। बात 1946 के अंतरिम सरकार बनाने के वक्त की हो या फिर आज संसद से लेकर परदेस की जमीन तक मचे घमासान की, सियासत का तौर-तरीका जस का तस है।

1946: 12 कमेटियों का समर्थन दरकिनार, सिर्फ नेहरू की अड़चन जीती

साल 1946 में आजादी चौखट पर खड़ी थी और पार्टी की कमान संभालने का पेंच फंसा था। उस वक्त 15 प्रांतीय कमेटियों में से 12 से ज्यादा कमेटियों ने सरदार वल्लभभाई पटेल के नाम पर अपनी रजामंदी दी थी, और पार्टी के कायदे के हिसाब से वही वाजिब हकदार थे। लेकिन जे.बी. कृपलानी और मौलाना आजाद के संस्मरण बताते हैं कि जवाहरलाल नेहरू किसी दूसरे नेता के मातहत काम करने पर राजी नहीं थे। उनका रुख था कि वे नंबर दो बनकर नहीं रहेंगे, जिससे पार्टी में टूट की नौबत आ गई थी। मुल्क के बंटवारे की आहट को देखकर सरदार पटेल ने फसाद के बजाय शांति को चुना और महात्मा गांधी का इशारा पाते ही बिना किसी हील-हुज्जत के अपना परचा वापस खींच लिया।

80 बरस बाद: संसद में हल्ला

आठ दशक गुजरने के बाद भी वही पैंतरेबाजी मैदान में दिखती है। नेता प्रतिपक्ष का पद सरकार से जवाब मांगने का जरिया होता है, मगर आज बात नीति-नियमों के विरोध से निकलकर सीधे संस्थाओं से टकराने तक जा पहुंची है। दोनों सदनों में कायदे की चर्चा और बातचीत के बदले रोजाना शोर-शराबा, तख्तियां और काम रोको का तमाशा चल रहा है।

हालत यह है कि चुनाव आयोग से लेकर देश की सबसे बड़ी अदालत के फैसलों पर खुले मंचों से कीचड़ उछाला जा रहा है। अपने देश के अंदरूनी मसलों और सियासी खुंदक को विदेशों में ले जाकर परोसा जा रहा है। प्रधानमंत्री का पद 140 करोड़ बाशिंदों के मत का प्रतीक होता है, उस पर चोट करने के चक्कर में देश की साख को बट्टा लगाया जा रहा है।

पड़ोसी मुल्क श्रीलंका जैसी बदहाली और उथल-पुथल की तस्वीरें सामने हैं। इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि गांधी जी मानते थे कि विदेशी मामलों और अंग्रेजी हुकूमत से बातचीत में नेहरू की पकड़ रहेगी, जबकि पटेल बिना कुर्सी के भी पूरे संगठन और देश को थामने की कूवत रखते थे।

नरेश चंद्र गुप्ता : वरिष्ठ अधिवक्ता