बच्चों को दवा पिलाना कई माता-पिता के लिए चुनौती होता है. इसी वजह से कुछ लोग दवा को दूध में मिलाकर दे देते हैं, ताकि बच्चा आसानी से पी ले. लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार यह आदत कई बार इलाज की प्रभावशीलता को कम कर सकती है और बच्चे की सेहत पर भी असर डाल सकती है. दवा कब, कितनी और किस तरीके से देनी है, यह डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही होना चाहिए. बिना जानकारी के दवा को दूध या किसी अन्य पेय में मिलाकर देना सही तरीका नहीं माना जाता.

विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ दवाएं दूध के साथ मिलकर ठीक तरह से शरीर में अवशोषित (Absorb) नहीं हो पातीं, जिससे उनका असर कम हो सकता है. यदि बच्चा पूरा दूध नहीं पीता, तो दवा की पूरी मात्रा भी शरीर तक नहीं पहुंचती. ऐसी स्थिति में इलाज प्रभावी नहीं रहता और बीमारी ठीक होने में अधिक समय लग सकता है.

डॉक्टर यह भी बताते हैं कि यदि दवा का स्वाद दूध में मिल जाए और बच्चे को वह पसंद न आए, तो वह भविष्य में दूध पीने से भी कतराने लग सकता है. इससे उसकी पोषण संबंधी जरूरतें प्रभावित हो सकती हैं. इसलिए दवा हमेशा उसी तरीके से दें, जैसा बाल रोग विशेषज्ञ (Pediatrician) ने बताया हो. अगर बच्चा दवा लेने में आनाकानी करता है, तो डॉक्टर से सुरक्षित विकल्प के बारे में सलाह लेना सबसे बेहतर रहता है.

विशेषज्ञ यह भी चेतावनी देते हैं कि बच्चों के इलाज में खुद डॉक्टर बनने की कोशिश खतरनाक हो सकती है. मामूली सर्दी-जुकाम में बिना सलाह कफ सिरप देना, बड़ों की आधी गोली खिलाना, एंटीबायोटिक का गलत इस्तेमाल करना, दवा का कोर्स बीच में छोड़ देना या अपनी मर्जी से डोज तय करना गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है.

इसी तरह की लापरवाही को रोकने के लिए सरकार ने भी बच्चों के कफ सिरप और कुछ अन्य दवाओं की बिक्री को डॉक्टर के प्रिस्क्रिप्शन से जोड़ने जैसे कदम उठाए हैं. विशेषज्ञों की सलाह है कि बच्चों की दवा को कभी भी दूध में मिलाकर न दें और हर दवा का इस्तेमाल केवल डॉक्टर के निर्देशों के अनुसार ही करें, क्योंकि छोटी-सी गलती भी बच्चे की सेहत पर बड़ा असर डाल सकती है.