
बिलासपुर : करीब आठ साल पुराने अपने दो आदेशों में लोक आयोग की शक्तियों को लेकर की गई टिप्पणियों को हटाने और आदेश में संशोधन की मांग हाई कोर्ट ने खारिज कर दी है। कोर्ट ने कहा कि आयोग जिन टिप्पणियों को अब गलत बता रहा है, उन्हें हटाने की मांग महज आदेश की भाषा सुधारने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके जरिए मूल मामलों में किए गए कानूनी निष्कर्षो को दोबारा चुनौती दी जा रही है। यदि 2018 के आदेश में कोई निष्कर्ष गलत था तो उसके खिलाफ अपील का वैधानिक रास्ता अपनाया जाना चाहिए था।
मामला जल संसाधन विभाग के तत्कालीन अधिकारियों जीएस ठाकुर, मुंगेली और विक्टर मिंज, अंबिकापुर से जुड़ा है। दोनों अधिकारियों के खिलाफ नाली निर्माण और लाइनिंग कार्य में अनियमितता के आरोपों के बाद कार्रवाई की गई थी। इसी मामले में छत्तीसगढ़ लोक आयोग ने जांच के बाद सरकारी खजाने को लाखों रुपये की क्षति होने की बात कही थी।
आयोग की जांच के बाद हुई थी वसूली
जीएस ठाकुर जल संसाधन विभाग में सब इंजीनियर के पद पर कार्यरत थे। उनके खिलाफ शिकायत के बाद लोक आयोग ने जांच की। 17 सितंबर 2012 को आयोग ने अपनी रिपोर्ट में तीन अधिकारी-कर्मचारियों को अनियमितता और सरकारी राशि के दुरुपयोग के लिए जिम्मेदार माना। आयोग ने सरकारी खजाने को 30 लाख 51 हजार 8 सौ 57 रुपये 55 पैसे की क्षति बताते हुए संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों के खिलाफ बड़ी विभागीय कार्रवाई की अनुशंसा की थी। आयोग ने राशि की वसूली और तीन महीने के भीतर राज्य सरकार से अनुपालन रिपोर्ट भी मांगी थी। इसके बाद राज्य सरकार ने जीएस ठाकुर से कुल नुकसान की एक-तिहाई राशि 10 लाख 17 हजार 2 सौ 85 रुपये 55 पैसे वसूलने का आदेश जारी कर दिया। इस आदेश को ठाकुर ने हाई कोर्ट में चुनौती दी। 3 जुलाई 2018 को तत्कालीन जस्टिस पी साम कोशी की सिंगल बेंच ने उनकी याचिका स्वीकार करते हुए लोक आयोग की अनुशंसा और राज्य सरकार के वसूली आदेश को रद्द कर दिया था।
बिना नोटिस व सुनवाई के वसूली पर जताई थी आपत्ति
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि राज्य सरकार ने वसूली का आदेश जारी करने से पहले याचिकाकर्ता को शो-कॉज नोटिस, प्रारंभिक जांच और अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं दिया। केवल लोक आयोग की अनुशंसा के आधार पर सीधे वसूली का आदेश जारी नहीं किया जा सकता। राज्य सरकार को सेवा नियमों में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होगा। कोर्ट ने यह भी कहा था कि पहले यह तय किया जाना जरूरी है कि संबंधित अधिकारी की वास्तविक लापरवाही या अनियमितता के कारण सरकारी खजाने को 10 लाख 17 हजार 2 सौ 85 रुपये 55 पैसे का नुकसान हुआ भी था या नहीं।
आयोग की शक्तियों पर की गई थी टिप्पणी
2018 के इसी आदेश के पैरा-9 में हाई कोर्ट ने लोक आयोग की शक्तियों को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी। कोर्ट ने कहा था कि आयोग शिकायत की जांच-पड़ताल कर अपने निष्कर्ष राज्य सरकार को भेज सकता है। इसके बाद राज्य सरकार को संबंधित अधिकारी के खिलाफ लागू सेवा नियमों के अनुसार कार्रवाई करनी होगी। कोर्ट ने यह भी कहा था कि आयोग किसी अधिकारी को दी जाने वाली सजा प्रस्तावित नहीं कर सकता और राज्य सरकार से अपनी अनुशंसा पर अनुपालन रिपोर्ट भी नहीं मांग सकता। हालांकि आदेश के अंतिम पैरा में कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि याचिका स्वीकार करने का यह अर्थ नहीं है कि राज्य सरकार आयोग की अनुशंसा के आधार पर कानून के मुताबिक आगे कार्रवाई नहीं कर सकती।
विक्टर मिंज के मामले में भी यही हुआ था फैसला
इसी कार्रवाई से जुड़े विक्टर मिंज ने भी 2012 में हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने लोक आयोग के 17 सितंबर 2012 के आदेश और राज्य सरकार के 4 अक्टूबर 2012 के वसूली आदेश को चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने उनके मामले में भी इसी आधार पर याचिका स्वीकार कर आदेशों को निरस्त किया था। इसके बाद छत्तीसगढ़ लोक आयोग ने वर्ष 2019 में दोनों मामलों में हाई कोर्ट के 2018 के आदेशों में संशोधन अथवा उन्हें वापस लेने की मांग करते हुए आवेदन पेश किए।
धारा 11 का हवाला देकर आयोग ने जताई थी आपत्ति
लोक आयोग की ओर से अधिवक्ता ए के सामंत्रे ने कोर्ट में तर्क रखा कि 3 जुलाई 2018 के आदेश के पैरा-9 में आयोग की शक्तियों को लेकर की गई टिप्पणी छत्तीसगढ़ लोक आयोग अधिनियम, 2002 की धारा 11(2) और 11(3) के विपरीत है। आयोग की ओर से यह भी कहा गया कि आदेश के अंतिम पैरा में राज्य सरकार को आयोग की अनुशंसा के आधार पर कानून के अनुसार कार्रवाई की स्वतंत्रता दी गई है, जबकि इसी आदेश के पहले हिस्से में आयोग के सजा प्रस्तावित करने और अनुपालन रिपोर्ट मांगने के अधिकार को सीमित बताया गया है। आयोग ने इसे आदेश में विरोधाभास बताते हुए संबंधित हिस्से में संशोधन की मांग की थी।
मूल मामले की दोबारा सुनवाई नहीं हो सकती
जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की सिंगल बेंच ने दोनों आवेदनों पर सुनवाई के बाद उन्हें खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि लोक आयोग की आपत्ति किसी स्पष्ट त्रुटि या आदेश की भाषा को ठीक कराने तक सीमित नहीं है। आयोग मूल रिट याचिकाओं में हाई कोर्ट द्वारा दिए गए कानूनी निष्कर्षों को ही दोबारा चुनौती दे रहा है। कोर्ट ने कहा कि यदि आयोग को 2018 के आदेश में अपनी शक्तियों को लेकर की गई टिप्पणियों या किसी कानूनी निष्कर्ष पर आपत्ति थी, तो उसके लिए अपील का वैधानिक रास्ता उपलब्ध था। आदेश में संशोधन या उसे वापस लेने की मांग के जरिए मूल रिट याचिकाओं की दोबारा सुनवाई नहीं कराई जा सकती। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने लोक आयोग के दोनों आवेदनों को खारिज कर दिया।