बिलासपुर हाईकोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा की गई करीब 80.36 करोड़ रुपए की संपत्तियों की कुर्की के खिलाफ दायर याचिकाओं को नामंजूर कर दिया है। यह प्रकरण दुर्ग स्थित मेसर्स मोक्षित कॉरपोरेशन तथा इसके साझेदारों के संबंध में है। मनी लॉन्ड्रिंग कानून (पीएमएलए) के अंतर्गत ईडी ने कंपनी की 46 चल और अचल संपत्तियों को अटैच किया था, जिसे कंपनी ने कोर्ट में चुनौती दी थी।

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की बेंच ने कानूनी स्थिति स्पष्ट की। अदालत ने बताया कि प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट में संपत्ति अटैचमेंट की कार्रवाई का विरोध करने के लिए पहले से ही एक पूरी वैधानिक प्रक्रिया दी गई है। ऐसी स्थिति में, उस निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना संविधान के अनुच्छेद 226 का उपयोग करते हुए तत्काल प्रभाव से हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल नहीं की जा सकती। इसी आधार पर कोर्ट ने याचिकाओं को विचार योग्य नहीं माना।

सप्लाई और भुगतान का यह है पक्ष

याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी कर रहे वकीलों ने अदालत को जानकारी दी कि उनकी फर्म छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉरपोरेशन लिमिटेड को लंबे समय से मेडिकल उपकरण, रिएजेंट सहित अन्य जरूरी सामग्रियों की सप्लाई का काम कर रही है। अदालत में पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार, फर्म ने विभाग को कुल 476.84 करोड़ रुपए की सामग्री उपलब्ध कराई थी। इसके मुकाबले उन्हें अब तक 205.07 करोड़ रुपए का ही भुगतान मिल पाया है।

ईओडब्ल्यू की एफआईआर और ईडी की कार्रवाई

इस पूरे प्रकरण की शुरुआत 22 जनवरी 2025 को हुई थी। तब रायपुर की आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) और एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) ने एक एफआईआर दर्ज की थी। इसी एफआईआर को आधार बनाते हुए प्रवर्तन निदेशालय ने 18 फरवरी 2025 को ईसीआईआर रजिस्टर्ड की और अपनी जांच शुरू कर दी। जांच एजेंसी का आरोप है कि टेंडर हासिल करने की प्रक्रिया में हेराफेरी करके अनुचित वित्तीय लाभ लिया गया।

एजेंसी ने इस तरह हासिल की गई रकम को लगभग 135.02 करोड़ रुपए आंका है। इसी जांच के नतीजे में ईडी ने पीएमएलए की धारा 5 (1) के तहत 13 मार्च 2026 को प्रोविजनल अटैचमेंट ऑर्डर जारी किया और 46 संपत्तियों को अपने कब्जे (अटैच) में ले लिया।

कारोबारी खर्चों की अनदेखी का आरोप

याचिकाकर्ताओं ने जांच एजेंसी की कार्यप्रणाली पर आपत्ति दर्ज कराई। उनका तर्क था कि ईडी ने एक वैध सरकारी अनुबंध से मिलने वाले सामान्य व्यावसायिक मुनाफे को गलत तरीके से 'अपराध से हासिल आय' (प्रोसीड्स ऑफ क्राइम) करार दे दिया है। याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, जब कोई व्यवसाय होता है तो उसमें उत्पादन, माल ढुलाई, टैक्स, वेयरहाउसिंग और सर्विसिंग जैसे कई खर्च होते हैं, लेकिन ईडी ने अपनी गणना में इन कारोबारी खर्चों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया। साथ ही, यह भी दलील दी गई कि जिन संपत्तियों को कुर्क किया गया है, उनमें से कुछ संपत्तियां कथित अपराध की अवधि से बहुत पहले ही खरीदी गई थीं, इसलिए उनका इस प्रकरण से कोई वास्ता नहीं है।