रायपुर। सोमवार को नवा रायपुर में कोयला मंत्रालय के 'स्टार रेटिंग पुरस्कार-2026' में बड़ा विरोधाभास देखने को मिला है। केंद्रीय कोयला एवं खान राज्य मंत्री सतीश चंद्र दुबे ने छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश की जिन 5 खदानों को सुरक्षा, पर्यावरण और स्थानीय विकास के मानकों पर '5-स्टार रेटिंग' का एक्सीलेंस अवार्ड दिया है, उनका ग्राउंड रिकॉर्ड इसके ठीक उलट है। जगत पहल की पड़ताल में खुलासा हुआ है कि जिन खदानों को देश में सर्वश्रेष्ठ बताकर पुरस्कृत किया गया, उनके खाते में फर्जी ग्रामसभा, खदान धंसने से मजदूरों की मौत, एनजीटी (NGT) के नियमों का खुला उल्लंघन और आदिवासियों के हिंसक प्रदर्शन दर्ज हैं। 

 

वित्त वर्ष 2024-25 के मूल्यांकन के आधार पर एसईसीएल (SECL) की बंगवार, खैराहा, बहेराबांध और पारसा ईस्ट एंड कांटा बासन (PEKB) समेत गारे पेलमा सेक्टर-III को यह अवार्ड मिला है।image_search_1793855511828

 

हसदेव की PEKB खदान: जहां फर्जी सहमति से उजड़े जंगल

सबसे ज्यादा विवादों में राजस्थान विद्युत उत्पादन निगम (RRVUNL) को आवंटित और अडानी समूह (MDO) द्वारा संचालित पारसा ईस्ट एंड कांटा बासन (PEKB) खदान है। अवार्ड के पैमाने में 'पर्यावरण प्रबंधन और स्थानीय समुदायों का हित' प्रमुख था। लेकिन हसदेव अरण्य क्षेत्र की इस खदान के लिए 'नो-गो' एरिया में लाखों पेड़ काटे गए। वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने इसके विस्तार पर रोक लगाने की सिफारिश की थी। इससे भी बड़ा फर्जीवाड़ा ग्राम सभाओं की सहमति में हुआ। सल्ही, हरिहरपुर और फतेहपुर जैसे गांवों में जाली दस्तावेजों के सहारे एनओसी ली गई। इसके विरोध में स्थानीय आदिवासियों ने 300 किलोमीटर का पैदल मार्च निकाला था और आज भी लगातार धरने जारी हैं।

गारे पेलमा: भारी धातु प्रदूषण,आदिवासियों का हिंसक बवाल

दूसरी 5-स्टार खदान छत्तीसगढ़ स्टेट पावर जनरेशन कंपनी लिमिटेड (CSPGCL) की गारे पेलमा सेक्टर-III (तमनार, रायगढ़) है। इस पूरे क्लस्टर में जमीन अधिग्रहण और विस्थापन को लेकर भारी आक्रोश है। स्थानीय हवा और पानी में भारी धातु (हेवी मेटल) प्रदूषण की रिपोर्टें सामने आ चुकी हैं। हाल ही में 2025 में इसके आसपास के सेक्टरों में जनसुनवाई के दौरान 14 गांवों के ग्रामीण सड़क पर उतर आए थे। यह विरोध इतना हिंसक था कि पुलिस पर पथराव हुआ, अधिकारियों की गाड़ियां फूंक दी गईं और कई लोग घायल हुए। फिर भी कागजों में यहां 'स्थानीय समुदायों का कल्याण' दिखाकर इसे 5 स्टार दे दिया गया।

एसईसीएल की जिन तीन अंडरग्राउंड खदानों (बंगवार, खैराहा और बहेराबांध) को सुरक्षित कामकाज का अवार्ड मिला, उनकी हकीकत पुलिस और कोर्ट के रिकॉर्ड में दर्ज है। इसी साल जून 2026 में बंगवार खदान में छत धंसने और 'एयर ब्लास्ट' होने से 2 मजदूरों की मौके पर ही मौत हो गई थी और कई घायल हुए थे। मुआवजे को लेकर ठेकेदारों और प्रबंधन के बीच लंबा विवाद चला। वहीं खैराहा खदान पर एनजीटी के आदेशों के उल्लंघन, अवैध परिवहन और डंपरों से होने वाली दुर्घटनाओं को लेकर कलेक्टर तक शिकायतें पहुंच चुकी हैं। प्रबंधन पर झूठे हलफनामे देने के आरोप भी हैं।

इन्हें भी जानें......

1. जांच रिपोर्ट रद्दी में: एसटी आयोग ने कहा था- क्लियरेंस रद्द हो

PEKB खदान के मामले में छत्तीसगढ़ अनुसूचित जनजाति आयोग ने खुद अपनी जांच में ग्राम सभा के दस्तावेजों को फर्जी पाया था। आयोग ने साफ सिफारिश की थी कि खदान का वन और पर्यावरण क्लियरेंस रद्द किया जाए। वन अधिकार अधिनियम (FRA) के सीधे उल्लंघन के बावजूद कोयला नियंत्रक संगठन के समीक्षकों ने खदान को एक्सीलेंस का तमगा दे दिया।

2. कागजों की बाजीगरी: एमपी की खदानें छत्तीसगढ़ के खाते में

पुरस्कारों की लिस्टिंग में भी खेल हुआ है। एसईसीएल की जिन तीन खदानों (बंगवार, खैराहा और बहेराबांध) को छत्तीसगढ़ की बताकर प्रचारित किया गया, वे असल में मध्य प्रदेश के शहडोल (सोहागपुर एरिया) में आती हैं। इन्हें केवल एसईसीएल के बिलासपुर मुख्यालय के कारण छत्तीसगढ़ की लिस्ट में जोड़ दिया गया।

3. अवार्ड के पैमानों पर ही फेल कोयला मंत्रालय की नीति के अनुसार यह अवार्ड 5 चीजों पर मिलता है- 

उत्पादन, परिचालन, सुरक्षा, पर्यावरण और सामाजिक प्रभाव। रिकॉर्ड बताते हैं कि इन पांचों खदानों ने उत्पादन तो जमकर किया, लेकिन सुरक्षा (बंगवार हादसा), पर्यावरण (हसदेव पेड़ों की कटाई) और सामाजिक प्रभाव (तमनार का हिंसक प्रदर्शन) के मानकों पर ये पूरी तरह फेल रही हैं।