नई दिल्ली | लीगल डेस्क । सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (एनजेए) ने महिलाओं के खिलाफ यौन अपराधों के मामलों में जजों के लिए एक विस्तृत गाइडलाइन जारी की है। इसमें जजों को सलाह दी गई है कि मुकदमों की सुनवाई करने और फैसले लिखने के दौरान पीड़िता के चरित्र, उसकी जीवनशैली, नैतिक धारणाओं और कपड़ों के बजाय पूरी तरह से केवल साक्ष्यों पर ही फैसला दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अनिरुद्ध बोस की अध्यक्षता में गठित विशेषज्ञ समिति ने यह रूपरेखा तैयार की है।

इन शब्दों के इस्तेमाल से बचना होगा

समिति की रिपोर्ट में बताया गया है कि न्यायिक भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं है, बल्कि यह पक्षपात रहित, गरिमापूर्ण और निष्पक्ष न्याय का मुख्य आधार होती है। अदालतों को 'लज्जा भंग', 'प्रोसिक्यूट्रिक्स (अभियोजन पक्ष की शिकायतकर्ता)', 'हवस', 'बेबस महिला', 'शर्म', 'इज्जत' और 'पवित्रता' जैसे शब्दों के इस्तेमाल से बचने को कहा गया है। असंवेदनशील भाषा, लैंगिक रूढ़ियों और पीड़िता को ही दोषी ठहराने वाली टिप्पणियों से उत्तरजीवियों (सर्वाइवर्स) को मानसिक आघात पहुंच सकता है। इस कारण वे न्याय की प्रक्रिया से दूर हो सकते हैं। इसलिए कोर्ट को हमेशा तटस्थ, सर्वाइवर-सेंट्रिक और सम्मानजनक भाषा अपनानी चाहिए।

गाइडलाइन की पृष्ठभूमि

यह रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के 10 फरवरी 2026 के आदेश के अनुपालन में तैयार की गई है। इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक विवादित फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2023 की जेंडर स्टीरियोटाइप्स हैंडबुक की समीक्षा करने और उसे भारतीय सामाजिक संदर्भ के अनुरूप ढालते हुए नई गाइडलाइन बनाने का निर्देश दिया था।

अदालती कार्यवाही और गवाहों के लिए अन्य निर्देश:

 सहमति का मूल्यांकन: शारीरिक चोट न होना, घटना के वक्त विरोध न करना या शिकायत दर्ज कराने में देरी होने को किसी भी रूप में सहमति का आधार न माना जाए।

  जिरह की सीमाएं: पीड़िता के निजी जीवन, उसके कपड़ों या उसके यौन इतिहास को लेकर अदालत में अप्रासंगिक अथवा अपमानजनक जिरह की अनुमति न दी जाए। शारीरिक स्वायत्तता, गरिमा, सहमति (कंसेंट) और बाल अधिकारों को प्राथमिकता मिले।

  नाबालिगों के मामले: 18 वर्ष से कम उम्र के मामलों की सुनवाई में केवल 'बच्चा' या 'नाबालिग' शब्द का ही उपयोग किया जाए।

 गोपनीयता व सुनवाई: पीड़ित की पहचान हर हाल में गोपनीय रखी जाए। सुनवाई ट्रॉमा-संवेदी तरीके से हो। जरूरत पड़ने पर इन-कैमरा (बंद कमरे में) सुनवाई और वीडियो लिंक की व्यवस्था की जाए।

  कानूनी मदद: एफआईआर दर्ज होते ही पीड़ितों को तत्काल कानूनी सहायता और मुआवजे का लाभ सुनिश्चित कराया जाए।

 गवाहों को सम्मान: गवाहों को 'कोर्ट का मेहमान' मानते हुए उन्हें पूरा सम्मान दिया जाए। अदालत में उन्हें अनावश्यक इंतजार न कराया जाए।