
रायपुर। छत्तीसगढ़ का जल संसाधन विभाग इन दिनों निर्माण और सिंचाई के बजाय अवैध वसूली और कमीशनखोरी का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है। सत्ता के गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा विभाग के प्रभारी प्रमुख की हो रही है। जून 2026 में उनकी सेवानिवृत्ति होनी है, लेकिन उससे पहले पूरे विभाग में एक अघोषित रेट कार्ड लागू कर दिया गया है। हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि विभाग के कार्यपालन अभियंताओं ने भारी मानसिक तनाव और प्रताड़ना के बीच सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय का दरवाजा खटखटाया है।
राजधानी रायपुर के शिवनाथ भवन से लेकर मैदानी स्तर तक इंजीनियर और ठेकेदार त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। शिकायत में स्पष्ट तौर पर बताया गया है कि बिना कमीशन दिए कोई भी फाइल आगे नहीं बढ़ती। चेंबर में बैठाकर बाकायदा हिसाब-किताब किया जाता है। विभागीय कार्यों के लिए जो रेट तय किए गए हैं, वे किसी भी भ्रष्ट तंत्र को शर्मसार करने वाले हैं। टेंडर पास कराने के एवज में तीन प्रतिशत, सप्लीमेंट्री प्रकरणों की स्वीकृति पर पांच प्रतिशत और भुगतान का चेक जारी करने के लिए डेढ़ प्रतिशत की सीधी मांग की जा रही है। पीस वर्क, सर्वे और अन्य कार्यों में तो यह कमीशन पंद्रह प्रतिशत तक पहुंच गया है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि प्रतिमाह दो लाख रुपये की एक अलग राशि सचिव के नाम पर मांगी जा रही है। ऊपर राशि पहुंचाने का डर दिखाकर अधिकारियों पर दबाव बनाया जा रहा है। ठेकेदारों को स्पष्ट निर्देश है कि बिना अग्रिम राशि दिए मरम्मत कार्यों का भी भुगतान नहीं होगा। फाइलें रोककर और अलॉटमेंट अटकाकर ऐसा कृत्रिम दबाव बनाया जा रहा है कि मजबूर होकर अधिकारियों को इस भ्रष्ट सिस्टम के आगे घुटने टेकने पड़ रहे हैं। तबादले और गोपनीय चरित्रावली खराब करने की धमकियों ने कार्यपालन अभियंताओं का मनोबल पूरी तरह तोड़ दिया है। यह सिर्फ भ्रष्टाचार का मामला नहीं है, बल्कि एक सुनियोजित तरीके से राज्य के खजाने और विकास कार्यों को बंधक बनाने की खौफनाक दास्तान है।