एक्सक्लूसिव इन्वेस्टिगेशन: नियम विरुद्ध पदस्थापना, भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग का बड़ा खेल

जगदलपुर। जल संसाधन विभाग में पदस्थापना नियमों की धज्जियां उड़ाकर करीब 100 करोड़ रुपए के भ्रष्टाचार का बड़ा मामला सामने आया है। प्रमुख अभियंता जल संसाधन कार्यालय द्वारा स्वयंभू अधीक्षण अभियंता वेद प्रकाश पांडे को कार्यपालन अभियंता (ईई) टीडीपीपी जनसाधारण संभाग जगदलपुर में संलग्न (अटैच) कर दिया गया है। राष्ट्रीय जगत पहल के हाथ लगे दस्तावेजों से खुलासा हुआ है कि वेद प्रकाश पांडे ने 18 मार्च 2024 के बाद से अब तक अपने पद और प्रभाव का दुरुपयोग करते हुए लगभग 100 करोड़ रुपए की वित्तीय अनियमितताओं को अंजाम दिया है। इसके अलावा, मध्य प्रदेश के पेंशनर माता-पिता के नाम पर 42 लाख रुपए का फर्जी चिकित्सा प्रतिपूर्ति (मेडिकल क्लेम) भी आहरित कर लिया गया। जब इस भारी भ्रष्टाचार और अनियमितताओं पर उनसे सवाल किया गया, तो उनका जवाब बेहद चौंकाने वाला था—उन्होंने इन तमाम वित्तीय गड़बड़ियों को 'देशहित और देशभक्ति' का नाम दे दिया।

हाईकोर्ट के स्टे के बावजूद कैसे बने बैठे अधीक्षण अभियंता?

दस्तावेजों की पड़ताल से सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि वेद प्रकाश पांडे आखिर अधीक्षण अभियंता (एसई) कैसे बन गए? शासन के स्पष्ट नियमों के अनुसार, जब तक किसी भी अधिकारी का विधिवत पदस्थापना आदेश जारी नहीं हो जाता, तब तक वह पदोन्नत पद का अधिकारी नहीं माना जा सकता। वेद प्रकाश पांडे के पदस्थापना आदेश पर माननीय उच्च न्यायालय बिलासपुर ने स्पष्ट रूप से रोक (स्टे) लगा रखी है। हाईकोर्ट के स्टे के बावजूद खुद को अधीक्षण अभियंता घोषित करना और उसी हैसियत से काम करना सीधे तौर पर न्यायालय की अवमानना और प्रशासनिक नियमों का खुला उल्लंघन है।

कलेक्टर को तहसीलदार के दफ्तर में बिठाने जैसा खेल

विभागीय सूत्रों के अनुसार, यह अटैचमेंट अपने आप में एक बड़ा प्रशासनिक मज़ाक है। एक स्वयंभू अधीक्षण अभियंता को कार्यपालन अभियंता (ईई) टीडीपीपी जनसाधारण संभाग जगदलपुर के अधीन संलग्न किया गया है। प्रशासनिक पदानुक्रम में यह बिल्कुल वैसा ही है, जैसे किसी जिले के कलेक्टर को तहसीलदार के कार्यालय में अटैच कर दिया जाए। यह नियम विरुद्ध पदस्थापना केवल इसलिए की गई ताकि जगदलपुर संभाग में करोड़ों के ठेकों और भुगतानों को अपने हिसाब से नियंत्रित किया जा सके।

माता-पिता एमपी के पेंशनर, फिर भी निकाल लिए 42 लाख

भ्रष्टाचार का दायरा केवल विभागीय कार्यों तक सीमित नहीं है। दस्तावेजों से पुष्टि होती है कि वेद प्रकाश पांडे ने अपने माता-पिता के इलाज के नाम पर 42 लाख रुपए की भारी-भरकम चिकित्सा प्रतिपूर्ति राशि आहरित की है। नियमतः उनके माता-पिता मध्य प्रदेश शासन के पेंशनर हैं, ऐसे में वे छत्तीसगढ़ या इस विभाग से इस तरह के क्लेम के दायरे में नहीं आते। इस स्पष्ट फर्जीवाड़े को लेकर जब पांडे से जवाब मांगा गया, तो उन्होंने कोई वैध दस्तावेज़ पेश करने के बजाय इसे "देशहित में किया गया कार्य" बताकर पल्ला झाड़ लिया।

कार्यालय के कक्ष में मंदिर, 100 करोड़ के भ्रष्टाचार को बताया देशभक्ति*

18 मार्च 2024 के पश्चात जगदलपुर टीडीपीपी संभाग में हुए लगभग 100 करोड़ रुपए के टेंडर, भुगतान और अन्य वित्तीय स्वीकृतियों में भारी गोलमाल किया गया है। दिखावे और खुद को बचाने के लिए इस अफसर ने अपने सरकारी कार्यालय के कक्ष के भीतर ही एक मंदिर की स्थापना कर ली है, ताकि आस्था की आड़ में भ्रष्टाचार पर पर्दा डाला जा सके। जब जगत पहल ने 100 करोड़ के इस संदिग्ध लेन-देन और अनियमितताओं पर सवाल किए, तो पांडे ने बेखौफ अंदाज में इसे भी 'देशभक्ति का कार्य' करार दिया।

नियम विरुद्ध आहरण

 

डबल क्लेम की आशंका: 42 लाख के मेडिकल क्लेम मामले में अब इस बात की जांच की जा रही है कि क्या मध्य प्रदेश सरकार से भी पेंशनर के तौर पर कोई चिकित्सा लाभ लिया गया है। ट्रेजरी से हुए इस भुगतान में बिल पास करने वाले एकाउंट्स अधिकारियों की भूमिका भी अब जांच के घेरे में आ गई है।

पदस्थापना का गणित

बिना अधिकार करोड़ों के साइन: हाईकोर्ट के स्टे के कारण वेद प्रकाश पांडे तकनीकी रूप से अधीक्षण अभियंता नहीं हैं। ऐसे में पिछले दो सालों में उनके द्वारा बतौर 'अधीक्षण अभियंता' पास किए गए करोड़ों के बिल, टेंडर और वर्क ऑर्डर वैधानिक रूप से शून्य हो सकते हैं। इससे सरकारी खजाने को हुए नुकसान की जवाबदेही तय होना बाकी है।

ईओडब्ल्यू जा सकता है मामला

विभागीय सूत्रों का कहना है कि 100 करोड़ के इस कथित भ्रष्टाचार और हाईकोर्ट के आदेशों की अवहेलना के दस्तावेज़ अब आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) और मुख्य सचिव कार्यालय तक पहुंच गए हैं। आने वाले दिनों में प्रमुख अभियंता कार्यालय के उन आला अफसरों पर भी गाज गिर सकती है, जिन्होंने नियमों को ताक पर रखकर इस अवैध अटैचमेंट को हरी झंडी दी थी।