बिलासपुर/नई दिल्ली। छत्तीसगढ़ के कारोबारी विजय कुमार केला को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी कानूनी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने सीबीआई द्वारा दर्ज एफआईआर, दाखिल चार्जशीट और निचली अदालत की कार्यवाही को रद्द करते हुए कहा कि जब बैंक और उधारकर्ता के बीच विवाद का वैध समझौता हो चुका हो, तब आपराधिक मुकदमा जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि किसी बैंक ऋण खाते का निपटारा आपसी सहमति से हो गया है और उस समझौते को डेब्ट्स रिकवरी ट्रिब्यूनल (DRT) की मंजूरी भी मिल चुकी है, तो उसी मामले में बाद में धोखाधड़ी का आपराधिक मुकदमा चलाना उचित नहीं है।

क्या है पूरा मामला?
रायपुर के कारोबारी विजय कुमार केला के परिवार की फर्म मेसर्स मोहन ट्रेडर्स ने यूको बैंक से व्यवसायिक ऋण लिया था। वर्ष 2009 तक यह बकाया राशि करीब 8 करोड़ रुपये तक पहुंच गई थी। लोन के बदले रायपुर स्थित अमलीडीह और बोरियाखुर्द की संपत्तियां गिरवी रखी गई थीं। नवंबर 2009 में फर्म का संचालन संभाल रहे परमानंद केला के निधन के बाद कारोबार प्रभावित हुआ और ऋण की किस्तें जमा नहीं हो सकीं। इसके चलते बैंक ने दिसंबर 2010 में खाते को एनपीए घोषित कर दिया और वसूली के लिए DRT जबलपुर में मामला दायर किया।

4.25 करोड़ में हुआ था फुल एंड फाइनल सेटलमेंट
मामला लंबित रहने के दौरान बैंक और फर्म के बीच समझौता हुआ। करीब 6.49 करोड़ रुपये के बकाया ऋण का निपटारा 4.25 करोड़ रुपये में वन-टाइम सेटलमेंट (OTS) के जरिए किया गया। समझौते को DRT की मंजूरी भी मिल गई और ऋण विवाद समाप्त हो गया।

ढाई साल बाद दर्ज हुई CBI शिकायत
ऋण खाते के बंद होने के लगभग ढाई वर्ष बाद, फरवरी 2018 में यूको बैंक के एक जोनल अधिकारी ने सीबीआई में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि लोन सीमा बढ़वाने के लिए फर्जी ऑडिट रिपोर्ट पेश की गई थी और बैंक को गलत जानकारी देकर संपत्तियों से जुड़ा लाभ उठाया गया। शिकायत के आधार पर सीबीआई ने मामला दर्ज कर विशेष अदालत रायपुर में चार्जशीट पेश की। बाद में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भी कार्यवाही पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, जिसके बाद विजय केला ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि व्यावसायिक विवादों के समाधान के बाद भी यदि आपराधिक मुकदमे जारी रखे जाएंगे, तो इससे बैंकिंग और आर्थिक व्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। अदालत ने माना कि ऐसे मामलों में लंबी आपराधिक कार्रवाई समझौते की भावना के विपरीत है और यह न्यायिक प्रक्रिया का अनुचित उपयोग माना जाएगा। कोर्ट ने इसी आधार पर सीबीआई की एफआईआर, चार्जशीट और संबंधित सभी कार्यवाहियों को रद्द कर दिया।