
रायपुर । प्रदेश में विकास और सड़क निर्माण के नाम पर सरकारी खजाने को किस तरह चूना लगाया जा रहा है, इसका एक जीता-जागता और चौंकाने वाला उदाहरण राजधानी रायपुर में देखने को मिला है। चौतरफा विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच सिस्टम की लापरवाही और ठेकेदारों की मनमानी का आलम यह है कि शहर के कई मुख्य इलाकों में सड़कों पर केवल 'लिक्विड डामर' का छिड़काव कर काम को अधूरा छोड़ दिया गया है। लाखों रुपए खर्च करने के बावजूद आम जनता को राहत मिलना तो दूर, उलटा ये सड़कें पहले से कहीं अधिक जर्जर, जानलेवा और खतरनाक हो गई हैं।
अमलीडीह की बदहाल सड़क: ग्राउंड जीरो से इन्वेस्टिगेशन में खुली पोल
राजधानी के अमलीडीह क्षेत्र की हालत इस कुप्रबंधन की सबसे बड़ी गवाह है। सिंगल चौक से लेकर चर्च भवन तक जाने वाली मुख्य सड़क की स्थिति बेहद खस्ताहाल हो चुकी है। स्थानीय रहवासियों के मुताबिक, करीब चार से पांच महीने पहले ठेकेदार ने सड़क निर्माण के नाम पर महज लिक्विड डामर (टैक कोट) का छिड़काव किया और उसके बाद से काम पूरी तरह बंद कर दिया।
नियमों के मुताबिक, टैक कोट डालने के तुरंत बाद डामर की मुख्य और मोटी परत (हॉट मिक्स) बिछाई जानी चाहिए थी। लेकिन पांच महीने का लंबा वक्त बीत जाने के बाद भी काम एक इंच आगे नहीं बढ़ा है। नतीजा यह है कि सड़क की ऊपरी सतह जगह-जगह से उखड़ गई है और नुकीली गिट्टियां पूरी तरह बाहर आ गई हैं। इन बिखरी हुई गिट्टियों के कारण दुपहिया वाहन चालक आए दिन फिसलकर दुर्घटना का शिकार हो रहे हैं।
इनसाइट्स: क्या कहती है तकनीकी जांच और क्यों बर्बाद हुआ पैसा?
निर्माण कार्यों और सिविल इंजीनियरिंग के जानकारों के अनुसार, आधा-अधूरा काम ही इस पूरी बर्बादी का मुख्य कारण है।
लिक्विड डामर या टैक कोट का मुख्य उपयोग सड़क की पुरानी और नई परतों के बीच एक मजबूत बॉन्डिंग (पकड़) बनाने के लिए किया जाता है।
यदि टैक कोट डालने के बाद सही समय (कुछ ही घंटों या दिनों के भीतर) पर डामर की अंतिम परत नहीं बिछाई जाए, तो धूल, मिट्टी, बारिश और वाहनों की लगातार आवाजाही से इस लिक्विड का चिपकने वाला गुण और प्रभाव पूरी तरह खत्म हो जाता है।
अमलीडीह में बिल्कुल यही तकनीकी चूक हुई है। विभागीय अधिकारियों की अनदेखी के चलते सड़क पर डाला गया लाखों रुपए का मटेरियल अब पूरी तरह मिट्टी में मिल चुका है।
विभाग का अजीबोगरीब तर्क: अंतरराष्ट्रीय तनाव से डामर हुआ महंगा
इस भारी लापरवाही और काम में लेटलतीफी पर जब विभागीय अधिकारियों और निर्माण एजेंसियों से जवाब मांगा गया, तो उनका तर्क बेहद अजीबोगरीब था। अधिकारी अपनी नाकामी और ठेकेदार की लापरवाही का सारा ठीकरा अंतरराष्ट्रीय बाजार और भू-राजनीतिक तनाव पर फोड़ रहे हैं।
अधिकारियों का कहना है कि ईरान-इजराइल और अमेरिका के बीच बढ़े वैश्विक तनाव के कारण कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की कीमतों में अचानक उछाल आया है, जिससे बिटुमेन (डामर) के रेट आसमान छूने लगे हैं।
क्या है सही प्रक्रिया और ठेकेदार ने कहां की चूक?
किसी भी खराब और उखड़ रही सड़क की स्थायी एवं गुणवत्तापूर्ण मरम्मत के लिए लोक निर्माण विभाग (PWD) के कुछ तय मानक होते हैं:
1. सफाई और बेस तैयार करना: सबसे पहले उखड़ी हुई पुरानी डामर परत को मशीनों से हटाकर सतह को पूरी तरह साफ किया जाता है।
2. टैक कोट लगाना: पुरानी और नई डामर परत के बीच एक मजबूत बंधन (ग्लू) के लिए लिक्विड डामर का छिड़काव किया जाता है। (ठेकेदार ने केवल यह काम किया और भाग गया)
3. हॉट मिक्स डामर बिछाना (यहीं हुई बड़ी चूक): टैक कोट के तुरंत बाद निर्धारित मोटाई की 'हॉट मिक्स डामर' परत बिछाकर उसे भारी रोलर से दबाया जाता है। अमलीडीह में यह अंतिम और सबसे जरूरी कदम पिछले पांच महीनों से उठाया ही नहीं गया।
जिम्मेदार अधिकारी का बेतुका बयान
डामर की सप्लाई नहीं होने के कारण इस सड़क पर डामर नहीं बिछाया जा सका है। गिट्टी इधर-उधर मत हो और सड़क बची रहे, इसलिए वहां प्राइमर (लिक्विड डामर) डाला गया है। डामर की सप्लाई सुचारू होने के बाद ही इस पर आगे का काम चालू किया जाएगा।
राजीव नशीने, कार्यपालन अभियंता, पीडब्ल्यूडी