सूरजपुर। सूरजपुर जिले के मदननगर में शुक्रवार को तीन साल से सुलग रही कोयला खदान के विरोध की आग आखिर भड़क ही गई। प्रतापपुर से लगे इस इलाके में एसईसीएल खदान के लिए जमीन अधिग्रहण का मामला अब पुलिस और ग्रामीणों के बीच खुले टकराव में तब्दील हो चुका है। हत्या के प्रयास के एक पुराने मामले में पुलिस जब खदान विरोधी आंदोलन की अगुवाई कर रहे सरपंच बाबूलाल पोया को गिरफ्तार करने पहुंची, तो पूरा गांव लाठी-डंडे और पारंपरिक हथियारों के साथ सड़क पर उतर आया। इस भीषण संघर्ष में एक डीएसपी समेत 26 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं।

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एसईसीएल की बसों में पहुंची पुलिस, भड़क गए ग्रामीण

शुक्रवार तड़के पुलिस बल ने मदननगर को चारों तरफ से घेर लिया। गांव तक पुलिस जवानों को पहुंचाने के लिए एसईसीएल की तरफ से 10 बसों का इंतजाम किया गया था। इन बसों से करीब 750 जवान वहां उतरे। ग्रामीणों ने भारी पुलिस बल और एसईसीएल की बसों को देखा, तो वे इसे खदान विरोध को कुचलने की प्रशासनिक कार्रवाई मान बैठे। देखते ही देखते ग्रामीणों ने पुलिस पर पथराव और लाठी-डंडों से हमला शुरू कर दिया। उग्र भीड़ ने मौके पर मौजूद दो निजी बसों में जमकर तोड़फोड़ की।

हालात इतने बेकाबू हो गए कि ग्रामीणों ने अंबिकापुर-प्रतापपुर मुख्य मार्ग पर चक्काजाम कर दिया। महिलाएं और पुरुष अपने हाथों में तीर-धनुष तथा लाठी-डंडे लेकर सड़क पर बैठ गए। देर शाम तक यह मुख्य रास्ता बंद रहा।

दो किलोमीटर दूर से निगरानी करता रहा प्रशासन

स्थिति बिगड़ती देख सूरजपुर कलेक्टर रेना जमील और एसपी योगेश पटेल मदननगर से दो किलोमीटर दूर धरमपुर स्कूल परिसर में अस्थायी कैंप लगाकर पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए रहे। भारी बल और वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी के बाद भी गांव में तनाव कम नहीं हुआ। पूरा दिन पुलिस और ग्रामीण आमने-सामने डटे रहे। विरोध का यह तरीका बताता है कि आंदोलन का मिजाज अब बदल रहा है; लोग सिर्फ ज्ञापन देने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आर-पार की लड़ाई के लिए मोर्चे पर आ गए हैं।

जमीन के बदले जमीन की मांग और पुराना दर्द

असल विवाद एसईसीएल की प्रस्तावित ओपनकास्ट खदान से है, जो ग्राम पंचायत चौरा, कनकनगर, मदननगर और जगन्नाथपुर के करीब 18 किलोमीटर दायरे में आ रही है। ग्रामीण पिछले तीन वर्षों से इसका डटकर विरोध कर रहे हैं। बीते सप्ताह ही सर्वे करने पहुंचे एसईसीएल के पांच कर्मचारियों को ग्रामीणों ने बंधक बना लिया था, जिन्हें पुलिस हस्तक्षेप के बाद छुड़ाया जा सका। ग्रामीणों की मांग स्पष्ट है—वे मौजूदा विस्थापन नीति के खिलाफ हैं। उनका आरोप है कि पहले से चल रही महान-3 परियोजना के प्रभावित परिवारों को अब तक न पूरा मुआवजा मिला है और न ही रोजगार। इसी कारण वे नकद मुआवजे के बजाय जमीन के बदले जमीन मांग रहे हैं।

अफसरों का तर्क- कार्रवाई का खदान से वास्ता नहीं

प्रशासन इस पूरे बवाल को सिर्फ एक आपराधिक मामले की कार्रवाई बता रहा है। एसपी योगेश पटेल के अनुसार, पुलिस कोयला खदान या सर्वे के लिए नहीं गई थी। टीम केवल पुराने अपराध में सरपंच के बेटे और अन्य आरोपियों को पकड़ने गई थी, जिन पर धारा 307 जैसे गंभीर अपराध दर्ज हैं। वहीं, कलेक्टर रेना जमील का कहना है कि एक आरोपी को तीन महीने से लगातार नोटिस दिया जा रहा था। जब वह पेश नहीं हुआ, तब पुलिस गांव गई। फिलहाल प्रशासन ग्रामीणों के प्रतिनिधिमंडल से बातचीत कर जाम खुलवाने और हालात सामान्य करने की कोशिश में लगा है।