
रायपुर। सरकारी विभागों में अधिकारियों की मनमर्जी का हैरान करने वाला मामला सामने आया है। शासन के आदेशों को दरकिनार कर अधिकारियों ने अपने ही स्तर पर अपना प्रमोशन कर लिया है। गरियाबंद के संभाग कार्यालय में पदस्थ कार्यपालन अभियंता एस के बर्मन और तंदुला दुर्ग सेवारत कार्यपालन अभियंता आशुतोष सारस्वत ने अपने कार्यालय में ही अपने प्रमोशन की नई पोस्टिंग तय कर ली है। असल में इन दोनों अफसरों की पदस्थापना संभाग में कार्यपालन अभियंता के तौर पर हुई है। पर इन्होंने अपनी मर्जी से संभाग दफ्तर में ही अधीक्षण अभियंता का पद बना डाला है।
अब संभाग कार्यालय से जो भी पत्राचार हो रहा है, उसमें ये दोनों अधिकारी खुद को अधीक्षण अभियंता लिखकर हस्ताक्षर कर रहे हैं। सरकारी नियमों के मुताबिक पत्राचार का यह तरीका अमान्य और नियम विरुद्ध है। क्यों कि शासन की ओर से इन अधिकारियों की पदस्थापना अधीक्षण अभियंता के पद पर कभी की ही नहीं गई। जब राज्य सरकार ने ऐसा कोई आदेश जारी ही नहीं किया , तो कागजों में खुद को अधीक्षण अभियंता लिखना नियम विरुद्ध है।
प्रशासनिक नियम यह कहता है कि जो भी अधिकारी या कर्मचारी जिस विभाग में अपनी सेवाएं देगा, वह केवल उसी कार्यालय के पत्र पर नियमानुसार अपना हस्ताक्षर करेगा। अधिकारी भले ही किसी भी पद पर हो, लेकिन हस्ताक्षर और सरकारी पत्राचार की प्रक्रिया उसी दफ्तर के नाम से होनी चाहिए जहाँ उसकी पदस्थापना है।
अधिकारियों की इस मनमानी का दूसरा उदाहरण टी डी पी पी जगदलपुर संभाग में भी देखने को मिला है। यहाँ वेद प्रकाश पांडे की मूल पदस्थापना कार्यपालन अभियंता के पद पर है। कायदे से उन्हें जगदलपुर संभाग से कार्यपालन अभियंता के रूप में ही अपना काम देखना चाहिए और उसी पदनाम से पत्रों का संपादन करना चाहिए।
अगर उन्हें प्रभारी अधीक्षण अभियंता का दायित्व मिला भी है, तो नियमों के तहत उस प्रभार का पत्राचार अधीक्षण अभियंता के कार्यालय से होना चाहिए। लेकिन वेद प्रकाश पांडे ऐसा नहीं कर रहे हैं। वे अपने कार्यपालन अभियंता वाले कार्यालय में बैठकर ही प्रभारी अधीक्षण अभियंता के नाम से पत्राचार कर रहे हैं। जिस कुर्सी और दफ्तर में वे बैठे हैं, वहां से अधीक्षण अभियंता की हैसियत से कागजी कार्यवाही करना गलत है।
दफ्तरों में चल रहे इस खेल से सरकारी काम का तरीका बिगड़ रहा है। अधिकारियों का यूं अपने मूल पद से अलग, मनचाहे पदनाम का इस्तेमाल कर पत्र जारी करना विभागीय प्रक्रिया को उलझा रहा है। बिना शासन के आदेश के नए पदनाम से हो रहा यह सारा पत्राचार प्रशासनिक कायदों की अनदेखी है। जिन पर नियमों के पालन की जिम्मेदारी है, वही अफसर कागजों में अपने मन मुताबिक पद लिखकर दफ्तरी चिट्ठी-पत्री कर रहे हैं।