
बिलासपुर : गाड़ी का फिटनेस सर्टिफिकेट नहीं है, तो दुर्घटना के बाद मुआवजे की पूरी जिम्मेदारी बीमा कंपनी पर नहीं डाली जा सकती। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने मोटर दुर्घटना दावा मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए साफ किया है कि वाहन के पास वैध फिटनेस सर्टिफिकेट नहीं होना बीमा पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन है। हालांकि, इस आधार पर पीड़ित परिवार को मुआवजे से वंचित नहीं किया जाएगा। बीमा कंपनी पहले मुआवजे की राशि अदा करेगी, लेकिन बाद में उसे वाहन मालिक और चालक से वसूलने का अधिकार होगा। अदालत ने इस मामले में ‘पे एंड रिकवर’ का सिद्धांत लागू करते हुए क्लेम ट्रिब्यूनल के फैसले को खारिज कर दिया।
टाटा टिपर की टक्कर से हुई थी मनीष दुबे की मौत
मामला वर्ष 2015 में कटघोरा-कोरबा क्षेत्र में हुए सड़क हादसे का है। एक टाटा टिपर की टक्कर से मोटरसाइकिल सवार मनीष दुबे गंभीर रूप से घायल हो गए थे। इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। हादसे के बाद पुलिस ने जांच कर चार्जशीट पेश की। इसके बाद मृतक के परिजनों ने मुआवजे के लिए क्लेम ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया। ट्रिब्यूनल ने मामले की सुनवाई के बाद 61.53 लाख रुपये से अधिक का मुआवजा निर्धारित किया था। लेकिन इस मामले में एक अहम तथ्य सामने आया। दुर्घटना के समय टाटा टिपर के पास वैध फिटनेस सर्टिफिकेट नहीं था। इसी आधार पर मुआवजे की जिम्मेदारी को लेकर कानूनी विवाद खड़ा हुआ।
बीमा कंपनी ने फैसले को दी हाई कोर्ट में चुनौती
क्लेम ट्रिब्यूनल के आदेश के खिलाफ नेशनल इंश्योरेंस कंपनी ने हाई कोर्ट में अपील दायर की। कंपनी का तर्क था कि फिटनेस सर्टिफिकेट के बिना वाहन चलाना बीमा पॉलिसी की शर्तों के विपरीत है। ऐसे में मुआवजे की पूरी जिम्मेदारी बीमा कंपनी पर डालना उचित नहीं है। मामले की सुनवाई जस्टिस संजय कुमार जायसवाल की एकल पीठ में हुई। कोर्ट ने बीमा कंपनी की दलील को स्वीकार करते हुए माना कि ट्रिब्यूनल ने पॉलिसी की शर्तों के उल्लंघन के पहलू पर सही विचार नहीं किया था। इसी आधार पर ट्रिब्यूनल के पुराने फैसले को खारिज कर दिया गया।
पीड़ित परिवार को राहत, लेकिन मालिक-ड्राइवर पर आर्थिक बोझ
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में पीड़ित परिवार के मुआवजे के अधिकार और बीमा पॉलिसी की शर्तो को ध्यान में रखा। अदालत ने ‘पे एंड रिकवर’ का सिद्धांत लागू किया। इसका मतलब है कि बीमा कंपनी पहले पीड़ित परिवार को निर्धारित मुआवजे का भुगतान करेगी। इसके बाद कानून के मुताबिक वाहन मालिक और चालक से उस रकम की वसूली कर सकेगी। इस फैसले का सीधा संदेश है कि बीमा कंपनी से मुआवजा मिलने का मतलब यह नहीं कि नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहन मालिक और चालक की जिम्मेदारी खत्म हो गई। वैध फिटनेस सर्टिफिकेट के बिना वाहन चलाने का मामला दुर्घटना के बाद भी भारी आर्थिक जिम्मेदारी का कारण बन सकता है। वहीं, मुआवजे के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे पीड़ित परिवार को राहत देने का रास्ता भी खुला रहेगा।