
Sleep Crisis in India: देर रात तक रील्स और वेब सीरीज देखने की आदत, सुबह जल्दी उठने की मजबूरी और वीकेंड पर घंटों सोकर नींद पूरी करने की कोशिश। बदलती लाइफस्टाइल के बीच भारतीयों की नींद पर संकट गहराता नजर आ रहा है। जानिए, आखिर कितनी खतरनाक हो सकती है नींद की यह कमी।
रात के 12 बजते ही मोबाइल हाथ में आता है और मन कहता है- बस एक रील और, बस एक एपिसोड और। देखते ही देखते रात के 2 या 3 बज जाते हैं। सुबह 7 बजे अलार्म बजता है, लेकिन शरीर बिस्तर छोड़ने को तैयार नहीं होता। आंखें खुल तो जाती हैं, मगर दिमाग पूरी तरह एक्टिव नहीं हो पाता। देर रात सोना, सुबह जल्दी उठना और फिर वीकेंड पर 10 से 12 घंटे सोकर पूरे हफ्ते की थकान मिटाने की कोशिश करना। यह कहानी उन तमाम लोगों की है जिनकी जिंदगी में काम, स्क्रीन और अनियमित दिनचर्या ने नींद के लिए जगह कम कर दी है। हालांकि, वीकेंड पर ज्यादा सोना कुछ हद तक नींद की कमी से उबरने में मदद कर सकता है, लेकिन यह नियमित रूप से कम सोने का पूरा विकल्प नहीं है।
भारत में नींद की कमी कितनी गंभीर? सर्वे में सामने आई चिंताजनक तस्वीर
भारत में लोगों की नींद से जुड़ी आदतों को लेकर सामने आए सर्वे इस समस्या की व्यापकता की ओर इशारा करते हैं। कम्युनिटी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लोकलसर्कल्स के 2025 के How India Sleeps सर्वे में 348 जिलों के 43 हजार से अधिक लोगों को शामिल किया गया। सर्वे के मुताबिक, 59 प्रतिशत लोगों ने बताया कि उन्हें रात में लगातार 6 घंटे से भी कम नींद मिलती है। इनमें 39 प्रतिशत लोगों ने 4 से 6 घंटे और 20 प्रतिशत ने 4 घंटे तक की नींद लेने की बात कही।
वहीं, वेकफिट के Great Indian Sleep Scorecard 2025 में 5 हजार लोगों के बीच किए गए सर्वे के दौरान 58 प्रतिशत भारतीयों ने रात 11 बजे के बाद सोने की बात स्वीकार की, जबकि 44 प्रतिशत लोगों ने सुबह उठने के बाद फ्रेश महसूस नहीं करने की जानकारी दी। ये आंकड़े बताते हैं कि चिंता सिर्फ देर रात तक जागने की नहीं, बल्कि पर्याप्त और सुकूनभरी नींद नहीं मिल पाने की भी है।
एक और रील, एक और एपिसोड… कैसे बिगड़ रही है नींद की दिनचर्या?
रात में बिस्तर पर जाने के बाद मोबाइल चलाना, सोशल मीडिया स्क्रॉल करना और लगातार वेब सीरीज देखना अब आम आदत बन चुकी है। शुरुआत में सिर्फ 10 मिनट के लिए फोन उठाने वाले लोग कब आधा या एक घंटा बिता देते हैं, इसका अंदाजा भी नहीं लग पाता। स्क्रीन पर लगातार बदलता कंटेंट दिमाग को सक्रिय रख सकता है, जिससे सोने का समय आगे खिसक जाता है। इसके अलावा, स्क्रीन की रोशनी और कंटेंट की उत्तेजना भी नींद आने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है।
नेशनल स्लीप फाउंडेशन की 2024 की कंसेंसस स्टेटमेंट में स्क्रीन के इस्तेमाल और नींद के बीच संबंधों पर उपलब्ध शोध की समीक्षा की गई। इसमें बच्चों और किशोरों के स्क्रीन इस्तेमाल तथा उनकी नींद पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर विशेषज्ञों के बीच सहमति सामने आई। यही वजह है कि सोने से पहले स्क्रीन टाइम कम करना और नियमित स्लीप रूटीन अपनाना नींद की गुणवत्ता सुधारने के लिए उपयोगी कदम माने जाते हैं।
कम नींद का असर सिर्फ थकान नहीं, दिमाग की रफ्तार पर भी पड़ता है
नींद की कमी का असर अगले दिन की सुस्ती तक सीमित नहीं रहता। इसका प्रभाव एकाग्रता, याददाश्त, निर्णय लेने की क्षमता और कामकाज पर भी पड़ सकता है। अमेरिका के सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) के अनुसार, 18 से 60 वर्ष की उम्र के वयस्कों को सामान्य तौर पर हर रात कम से कम 7 घंटे की नींद लेनी चाहिए। लगातार कम सोने से स्वास्थ्य और दैनिक गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं।
वहीं, Occupational and Environmental Medicine में प्रकाशित ए. एम. विलियमसन और ए. एम. फेयर के अध्ययन में पाया गया कि 17 से 19 घंटे तक लगातार जागने के बाद कुछ परीक्षणों में लोगों का प्रदर्शन 0.05 प्रतिशत ब्लड अल्कोहल कंसंट्रेशन के बराबर या उससे भी खराब स्तर पर पहुंच गया। कुछ परीक्षणों में प्रतिक्रिया देने की गति में भी उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई। यानी नींद की कमी में काम करना या वाहन चलाना हमारी सतर्कता और प्रतिक्रिया क्षमता को प्रभावित कर सकता है।
क्या वीकेंड पर 12 घंटे सोकर पूरी हो सकती है नींद?
पूरे हफ्ते कम सोने के बाद शनिवार और रविवार को देर तक सोना कई लोगों के लिए राहत का तरीका बन गया है। लेकिन वीकेंड की लंबी नींद को पूरे सप्ताह की नींद की कमी का स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता। लोकलसर्कल्स के 2025 के सर्वे में 38 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे वीकेंड या छुट्टियों में भी अपनी नींद की कमी पूरी नहीं कर पाते। पर्याप्त नींद के लिए रोजाना सोने और जागने का समय नियमित रखना ज्यादा महत्वपूर्ण है। कभी-कभार ज्यादा सोने से थकान कम हो सकती है, लेकिन लगातार नींद की कमी को नजरअंदाज करना शरीर की रिकवरी और दैनिक प्रदर्शन पर असर डाल सकता है।
स्लीप क्राइसिस से बचने के लिए बदलनी होगी रोजमर्रा की आदत
बढ़ते काम के घंटे, देर रात तक डिजिटल कंटेंट का इस्तेमाल और अनियमित दिनचर्या के बीच नींद को प्राथमिकता देना पहले से ज्यादा जरूरी हो गया है। विशेषज्ञों की सलाह के मुताबिक, सोने से पहले स्क्रीन टाइम कम करना, नियमित समय पर बिस्तर पर जाना, कैफीन का देर शाम सेवन सीमित करना और शांत वातावरण में सोना बेहतर नींद की दिशा में मददगार हो सकता है। यदि पर्याप्त समय सोने के बावजूद लगातार थकान बनी रहती है या नींद से जुड़ी परेशानी लंबे समय तक जारी रहती है, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।
आखिरकार, रात का एक और एपिसोड, एक और रील या ऑफिस का एक अतिरिक्त मेल कुछ मिनट जरूर दे सकता है, लेकिन अगर इसकी कीमत नींद से चुकाई जा रही है, तो अगली सुबह इसकी भरपाई फोकस, मूड और काम करने की क्षमता से करनी पड़ सकती है। शरीर के लिए यह मायने नहीं रखता कि आप रात 2 बजे मनोरंजन कर रहे थे या ऑफिस का काम। उसके लिए जरूरी है पर्याप्त और नियमित नींद। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि हम कितने बजे सोते हैं, बल्कि यह भी है कि क्या हम अपने शरीर और दिमाग को उतना आराम दे रहे हैं, जितना उन्हें चाहिए?