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रायपुर। राजधानी रायपुर की सड़कों पर अब कानून का नहीं बल्कि बदमाशों का खौफ नजर आ रहा है। शहर में लागू कमिश्नरेट सिस्टम पूरी तरह से फेल साबित हो रहा है। कुशालपुर ओवरब्रिज के पास सरेआम हुई गैंगवार ने पुलिस के तमाम सुरक्षा दावों की पोल खोल कर रख दी है। इस खूनी संघर्ष में सड़कों पर खुलेआम तलवारें फरसे और चाकू लहराए गए। दहशत का आलम यह था कि राहगीर अपनी जान बचाकर भागते नजर आए और यातायात पूरी तरह से ठप हो गया। हैरानी की बात यह है कि इस खौफनाक वारदात के मुख्य आरोपी अब भी पुलिस की गिरफ्त से बाहर हैं और शहर की फिजा में खौफ घोल रहे हैं।
यह पूरा विवाद महज वर्चस्व की लड़ाई और झूठी शान से जुड़ा है। स्कॉर्पियो गैंग और एक्टिवा गैंग के बीच शहर का सरगना बनने की होड़ मची है। घटना की शुरुआत अमलेश्वर के बैली फार्महाउस में आयोजित एक बर्थडे पार्टी से हुई थी। आशु तिवारी के जन्मदिन के जश्न में सचिन पोपटानी और आशीष के बीच इस बात को लेकर बहस छिड़ गई कि असल में शहर पर राज किसका है। उस वक्त वहां मौजूद अन्य युवकों ने बीच बचाव कर मामला शांत करा दिया था लेकिन यह चिंगारी बुझी नहीं थी बल्कि कुशालपुर ओवरब्रिज के पास आकर भड़क उठी।
पार्टी खत्म होने के बाद दोनों गुटों के लड़के अपनी अपनी गाड़ियों में वहां से निकले और ओवरब्रिज के पास आमने सामने आ गए। देखते ही देखते बीच सड़क युद्ध के मैदान में तब्दील हो गई। दोनों तरफ से घातक हथियारों का खुलकर इस्तेमाल किया गया। इस पूरी वारदात ने यह साबित कर दिया है कि युवाओं में आपराधिक प्रवृत्ति किस कदर हावी हो रही है। इस गैंगवार में कई नाबालिगों के शामिल होने की बात भी सामने आ रही है जो समाज और पुलिस प्रशासन दोनों के लिए एक बहुत ही गहरी चिंता का विषय है। घटना के वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहे हैं लेकिन पुलिस की सुस्ती बरकरार है।
घटना के इतने दिन बीत जाने के बाद भी रायपुर पुलिस के हाथ पूरी तरह से खाली हैं। राजनीतिक रसूख रखने वाले इमरान सुल्तान मिहिर भंसाली और आदर्श सिंह सहित स्कॉर्पियो गैंग के मुख्य चेहरे अब भी आराम से फरार हैं। पुलिस ने घटनास्थल से महज एक फरसा बरामद कर अपनी कार्रवाई की औपचारिकता पूरी कर ली है। पुलिस के आला अधिकारी जांच के नाम पर सिर्फ टीमें गठित करने और अलग अलग ठिकानों पर दबिश देने का रटा रटाया बयान मीडिया को दे रहे हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब राजधानी के बीचों बीच सरेआम हथियारों के साथ ऐसा खूनी खेल खेला जा सकता है तो आम जनता खुद को सुरक्षित कैसे महसूस करे। कमिश्नरेट सिस्टम लागू होने के बाद यह उम्मीद थी कि अपराधियों में खौफ पैदा होगा और अपराधों पर लगाम लगेगी लेकिन ऐसी घटनाएं पुलिस की पूरी कार्यप्रणाली पर बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती हैं। पुलिस प्रशासन को अब अपने कागजी दावों से बाहर निकलकर इन फरार बदमाशों को जल्द से जल्द सलाखों के पीछे डालना होगा ताकि शहर की जनता में पुलिस और कानून के प्रति दोबारा भरोसा कायम हो सके।