बिलासपुर : निजी स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) के तहत आरक्षित 25 प्रतिशत सीटों को भरने के मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने साफ कहा कि आरटीई कानून और नियमों को लागू करने में राज्य सरकार ‘कछुआ चाल’ से आगे बढ़ रही है। 8 सितंबर को दिए गए निर्देश के बावजूद सरकार स्कूलवार आरक्षित सीटों, दाखिल बच्चों और रिक्त सीटों का पूरा विवरण पेश नहीं कर सकी। कोर्ट ने कहा कि प्रस्तुत शपथपत्र आदेश के अनुरूप नहीं है। अब राज्य सरकार को 15 दिन के भीतर विस्तृत शपथपत्र दाखिल कर पूरा रिकॉर्ड पेश करने का निर्देश दिया गया है।

स्कूलवार देनी होगी पूरी जानकारी

चीफ जस्टिस कृष्ण राम महापात्र और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने सुनवाई के दौरान पूछा कि आरटीई के तहत आरक्षित सीटों को भरने के लिए बनाई गई कार्ययोजना के खंड-5 को किस तरह लागू किया जा रहा है, इसकी स्पष्ट जानकारी शपथपत्र में क्यों नहीं दी गई? कोर्ट ने सरकार से स्कूलवार यह जानकारी मांगी है कि कितनी सीटें आरटीई के लिए आरक्षित हैं, उनमें कितने बच्चों को प्रवेश दिया गया और कितनी सीटें अब भी खाली हैं। संबंधित दस्तावेज भी शपथपत्र के साथ पेश करने के निर्देश दिए गए हैं।

‘क्षेत्र की सीमा’ का दिया हवाला, कोर्ट ने किया इनकार

सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से उप महाधिवक्ता प्रसून भादुड़ी ने स्कूलों के आसपास निर्धारित क्षेत्र की सीमा से जुड़े नियमों का हवाला देते हुए सरकार का पक्ष रखा। इस पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि संबंधित नियम आरटीई कानून के तहत निर्धारित 25 प्रतिशत आरक्षित सीटों के प्रावधान को बदलने की अनुमति नहीं देता। कोर्ट ने राज्य सरकार के इस तर्क को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

2016 में भी दिए थे निर्देश, स्थिति जस की तस

डिवीजन बेंच ने 14 सितंबर 2016 के पूर्व आदेश का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि उस समय भी राज्य सरकार को निजी स्कूलों में आरटीई की 25 प्रतिशत आरक्षित सीटें पूरी तरह भरने के लिए नई व्यवस्था बनाने का सुझाव दिया गया था। तब कोर्ट ने पाया था कि निजी स्कूलों में कई वर्षों से आरक्षित सीटें पूरी तरह नहीं भर पा रही थीं। इसे देखते हुए कोर्ट ने ऐसी व्यवस्था का सुझाव दिया था, जिसमें अभिभावक सीधे संबंधित स्कूल में आवेदन करें और सरकारी अधिकारियों की भूमिका केवल बच्चों की पात्रता जांचने तक सीमित रहे।

अधिक दूरी वालों के लिए भी सुझाया था रास्ता

कोर्ट ने पड़ोस के क्षेत्र और तीन किलोमीटर से अधिक दूरी से आवेदन करने वाले बच्चों के लिए अलग व्यवस्था बनाने का सुझाव भी दिया था। वहीं, यदि आरक्षित सीटों से अधिक आवेदन आते हैं तो लॉटरी के जरिए चयन करने की व्यवस्था पर भी विचार करने को कहा गया था। लेकिन सरकार की ओर से पेश किए गए अलग-अलग शपथपत्रों से यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि 2016 में दिए गए निर्देशों और सुझावों पर वास्तव में कितना अमल हुआ।

15 दिन में जवाब, 18 नवंबर को होगी अगली सुनवाई

मामले में हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को 15 दिन के भीतर नया और विस्तृत शपथपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया है। वहीं, मामले से जुड़े एक हस्तक्षेप आवेदन पर निजी शैक्षणिक संस्था की ओर से आपत्ति दाखिल करने के लिए भी 15 दिन का समय दिया गया है। जनहित याचिका पर अगली सुनवाई के लिए डिवीजन बेंच ने 18 नवंबर की तारीख तय की है।