
रायपुर। छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का ढर्रा क्यों बिगड़ रहा है, इसका जवाब शिक्षा विभाग के अपने ढीले-ढाले कामकाज में ही छिपा है। राज्य के स्कूलों में शिक्षकों के 50 हजार से अधिक पद खाली पड़े हैं, लेकिन बच्चों को पढ़ाने वाले कई शिक्षक जिला दफ्तरों में बैठकर फाइलों का काम निपटा रहे हैं। राजीव गांधी शिक्षा मिशन के बंद होने के बाद भी पुराने ढांचे के तहत बने डीएमसी (जिला मिशन समन्वयक) के पदों पर शिक्षक ही जमे हुए हैं। इस पर विभाग की कार्यशैली को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।
साल 2019 में राजीव गांधी शिक्षा मिशन का नाम बदलकर समग्र शिक्षा अभियान कर दिया गया था। अब सभी योजनाएं इसी नए मिशन से चल रही हैं। इसके बाद भी पुराने सिस्टम के डीएमसी पद प्रदेश के सभी 33 जिलों में अब तक चल रहे हैं। विभाग ने कभी यह देखने की जरूरत नहीं समझी कि आज के समय में इन पदों की कितनी जरूरत है और इससे स्कूलों में शिक्षकों की किल्लत कितनी बढ़ रही है।
विधानसभा में दी गई सरकारी जानकारी के मुताबिक प्रदेश के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के 50,472 पद खाली हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब स्कूलों में शिक्षकों का अकाल है, तो मास्टरजी को जिला दफ्तरों के प्रशासनिक और लिखा-पढ़ी के काम में क्यों लगाया गया है? क्या जिलों में यह काम विभाग के बाकी अफसरों और कर्मचारियों से नहीं कराया जा सकता?
शिक्षाविदों का कहना है कि जब जिलों में डीएमसी, एबीईओ और एडीईओ जैसे अफसर पहले से तैनात हैं, तो शिक्षकों से क्लर्क वाला काम कराने का क्या तुक है? डीएमसी का मुख्य काम योजनाओं का तालमेल, देखरेख और रिपोर्ट बनाना है। शिक्षकों को स्कूलों से हटाकर फाइलें बनवाना बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। दफ्तरों में जमे शिक्षकों को तुरंत वापस कक्षाओं में भेजा जाना चाहिए, ताकि पढ़ाई पटरी पर लौट सके।
मामले में समग्र शिक्षा मिशन के एएमडी के. कुमार का कहना है कि इसमें क्या तकनीकी दिक्कत है, इसे दिखवा लेते हैं। सेटअप के बारे में भी जानकारी लेकर जरूरी कदम उठाए जाएंगे।