रायपुर | प्रदेश के सरकारी विभागों में आरक्षित पदों पर फर्जी तरीके से काबिज कर्मचारियों को बाहर करने में पूरा प्रशासनिक अमला हांफ रहा है। शिक्षा, कृषि, उद्यानिकी और पंचायत विभागों में कई ऐसे कर्मचारी वर्षों से अपनी कुर्सियों पर जमे हुए हैं, जिन्होंने मेडिकल बोर्ड से मिलीभगत करके बहरेपन या अन्य दिव्यांगता का फर्जी प्रमाण पत्र हासिल कर लिया है। कई तो ऐसे हैं जो इग्नू और प्रदेश की अन्य यूनिवर्सिटी की बोगस डिग्री के सहारे सरकारी नौकरी का फायदा उठा रहे हैं। जांच के निर्देश निकले, अफसरों ने सूचियां तैयार कीं, लेकिन जमीनी स्तर पर कार्रवाई आज भी रुकी हुई है।

सिंडिकेट का केंद्र बने गांव, वार्ड पंच ने खोली पोल

ग्राउंड रिपोर्टिंग और पड़ताल में यह बात निकलकर आई है कि मुंगेली जिले के लोरमी ब्लॉक का झाफल गांव ऐसे फर्जी दिव्यांगता प्रमाण पत्रों का बड़ा केंद्र बन चुका है। यहां भारी संख्या में लोग पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद भी इन प्रमाण पत्रों के सहारे सरकारी विभागों में अपनी जगह बनाए हुए हैं। झाफल के साथ-साथ सेमरिया, सारधा, सुकली और विचारपुर समेत आसपास के गांवों में भी यह बीमारी फैल चुकी है।

वार्ड पंच देवी सिंह राजपूत का कैमरे पर यह कहना कि "आप किस तरह के बहरे की बात कर रहे हैं, सर्टिफिकेट वाले या असली?" इस पूरे सिंडिकेट की पोल खोल देता है। ग्रामीणों की बातों पर गौर करें तो डॉक्टरों की मदद से फर्जीवाड़े का यह खेल चला और ऊपर से नीचे तक सबकी इसमें हिस्सेदारी नजर आती है।

कार्रवाई से बचने कोई छुट्टी पर, तो कोई जांच से नदारद

इस पूरे मामले में शासन-प्रशासन की लाचारी देखने लायक है। दिव्यांग संघ के प्रांताध्यक्ष संतोष टोंडे के अनुसार, शासन को 127 संदिग्ध कर्मचारियों की पूरी सूची दी गई है। इनमें से 46 कर्मचारियों को सुप्रीम कोर्ट तक से कोई राहत नहीं मिली है। इसके बावजूद संबंधित विभाग जांच पूरी नहीं कर पाए हैं।

कार्रवाई के डर से कर्मचारी नए-नए बहाने बना रहे हैं। कलेक्टोरेट के आवक-जावक में पदस्थ कृषि विभाग के आरएईओ गुलाब सिंह राजपूत बहरेपन का सर्टिफिकेट लगाकर नौकरी में आए, लेकिन बिना हियरिंग एड के काम करते हैं और कोचिंग भी चलाते हैं। जांजगीर-चांपा के शिक्षक सुधेश कुमार सिंह चंदेल की जांच में दिव्यांगता 30% मिली, जबकि नियम 40% का है, फिर भी बर्खास्तगी अटकी है।

ग्रामीण उद्यान विस्तार अधिकारी पूजा पहारे हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी मेडिकल परीक्षण से बचने के लिए लगातार छुट्टी पर हैं। व्याख्याता अविनाश राठौर की बीएड डिग्री को इग्नू ने अपने रिकॉर्ड में होने से ही इनकार कर दिया है। व्याख्याता अक्षय राजपूत की मेडिकल कॉलेज में हुई जांच में दोनों कान सामान्य मिले हैं। मागरिता टोप्पो ने सरकारी वेतन लेते हुए बस्तर विवि से नियमित बीएड किया। इन सब मामलों में न एफआईआर हुई और न ही बर्खास्तगी।

सिर्फ कागजों तक सीमित रहे आदेश

मई 2023 में सामान्य प्रशासन विभाग ने संदिग्ध प्रमाण पत्रों की जांच के निर्देश दिए थे। इसके बाद अगस्त 2024 में मुंगेली कलेक्टर ने बर्खास्तगी और प्रमाण पत्र जारी करने वाले डॉक्टरों की जांच के आदेश जारी किए। जनवरी 2026 में कृषि विभाग ने 17 संदिग्ध कर्मचारियों की सूची जिलों को भेजी। इतने पत्राचार के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई। मुंगेली के अपर कलेक्टर जेएल यादव मजबूरी जताते हुए कहते हैं कि हाईकोर्ट के आदेश पर स्पेशल टीम तो बनी, लेकिन कर्मचारी जांच के लिए आ ही नहीं रहे हैं और उन्हें जबरदस्ती ले जाना मुमकिन नहीं है।

जिम्मेदारों ने साधी चुप्पी

मुंगेली जिला अस्पताल के तत्कालीन सिविल सर्जन डॉ. एमके रॉय ने इस मामले में कुछ भी कहने से इनकार कर दिया और सवालों से बचते रहे। सामान्य प्रशासन विभाग के सचिव अविनाश चंपावत का कहना है कि उनके पास बोगस दिव्यांगों की समग्र जानकारी नहीं है। वहीं समाज कल्याण विभाग की सचिव शहला निगार के अनुसार, जांच और कार्रवाई का जिम्मा संबंधित विभाग का ही होता है।