
रायपुर। दशकों तक छत्तीसगढ़ की पहचान बस्तर के बीहड़ों और वामपंथी उग्रवाद से जुड़ी रही, लेकिन आज परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है। राज्य अब केवल शांति बहाली तक सीमित नहीं है, बल्कि निवेश, बुनियादी ढांचे और अत्याधुनिक तकनीक के दम पर विकास की नई इबारत लिख रहा है।
'विकसित छत्तीसगढ़ कॉन्क्लेव 2026' के दौरान छत्तीसगढ़ पुलिस के डीजी ट्रेनिंग और स्टेट पुलिस अकादमी के निदेशक जी.पी. सिंह ने वरिष्ठ पत्रकार अर्पित गुप्ता से खास बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस ग्राउंड रिपोर्टिंग इंटरव्यू के संपादित अंश:
सवाल: सुरक्षा को निवेश और विकास की चर्चा से जोड़ना कितना जरूरी है?
जी.पी. सिंह: सुरक्षा कोई अलग विषय नहीं है, यह किसी भी आर्थिक ढांचे की बुनियाद है। कोई भी बड़ा उद्योगपति या निवेशक जमीन, बिजली और बुनियादी ढांचे के साथ-साथ यह देखता है कि वहां का माहौल कितना सुरक्षित और स्थिर है। अगर कर्मचारी निडर हैं और लॉजिस्टिक्स में कोई रुकावट नहीं है, तभी निवेश आता है। सुरक्षा से विश्वास बनता है, विश्वास से निवेश आता है और निवेश से रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं।
सवाल: नक्सल-मुक्त छत्तीसगढ़ बनाने की रणनीति में क्या बड़ा बदलाव आया है?
जी.पी. सिंह: अब हम इसे सिर्फ एक सुरक्षा अभियान या बंदूक की लड़ाई के रूप में नहीं देखते। हमारी नई रणनीति 'क्लियर, होल्ड एंड बिल्ड' (साफ करो, पकड़ बनाए रखो और निर्माण करो) पर आधारित है। सबसे पहले खुफिया जानकारी के आधार पर क्षेत्र को सुरक्षित किया जाता है। फिर वहां स्थायी सुरक्षा उपस्थिति बनाई जाती है और इसके बाद उस जगह को शासन, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा पक्की सड़कों से भरा जाता है। लक्ष्य सिर्फ हिंसा रोकना नहीं, बल्कि ऐसी परिस्थितियां बनाना है कि हिंसा कभी लौटकर न आ सके।
सवाल: अंदरूनी इलाकों में 'नियाद नेल्लानार' योजना और बुनियादी ढांचे का क्या असर पड़ा है?
जी.पी. सिंह: पहले भूगोल ही सबसे बड़ी बाधा था। अब तक सुदूर इलाकों में 4,000 किलोमीटर से ज्यादा सड़कें और 1,333 टेलीकॉम टावर चालू किए जा चुके हैं। सड़कें सिर्फ पुलिस बलों के लिए नहीं बनीं, बल्कि उनके जरिए डॉक्टर, शिक्षक और सरकारी योजनाएं अंतिम व्यक्ति तक पहुंच रही हैं। 'नियाद नेल्लानार' का सीधा अर्थ है—विकास के लाभ को उस आखरी गांव तक पहुंचाना जहां कभी पहुंचना नामुमकिन था। सुरक्षा शिविर अब केवल चौकियां नहीं, बल्कि विकास के नए केंद्र बन चुके हैं।
सवाल: आधुनिक दौर में साइबर अपराध और एआई-ड्रोन तकनीक पुलिस के लिए कितनी बड़ी चुनौती और हथियार हैं?
जी.पी. सिंह: तकनीक एक 'बल गुणक' (फोर्स मल्टीप्लायर) है, लेकिन यह मानवीय समझ का विकल्प नहीं हो सकती। हम ड्रोन, एआई और डेटा एनालिटिक्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ, अर्थव्यवस्था डिजिटल होने के साथ यूपीआई फ्रॉड, डिजिटल-अरेस्ट और फिशिंग जैसे खतरे बढ़े हैं। हमारी रणनीति दोतरफा है—नागरिकों को जागरूक करना और पुलिसकर्मियों को साइबर-सक्षम बनाना।
सवाल: निवेशकों और नए उद्यमियों के लिए आपका क्या संदेश है?
जी.पी. सिंह: सुरक्षा केवल घटना होने के बाद की कार्रवाई नहीं है, यह जोखिम को पहले से भांपने की क्षमता है। हम 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' से आगे बढ़कर 'ईज ऑफ रनिंग बिजनेस' का वातावरण दे रहे हैं। छत्तीसगढ़ अब सिर्फ नक्सल-मुक्त होने की राह पर नहीं है, बल्कि यह सुरक्षित, आत्मविश्वासी, डिजिटल रूप से सक्षम और निवेश-रेडी राज्य बन चुका है।