रायपुर : छत्तीसगढ़ के महिला एवं बाल विकास विभाग (WCD) में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को बांटी गई साड़ियों के धागों में कमीशनखोरी की ऐसी गांठें बंधी हैं, जो अब धीरे-धीरे खुल रही हैं। प्रदेश की 1.94 लाख महिलाओं को यूनिफॉर्म के नाम पर जो साड़ियां पहनाई गईं, उसकी बुनाई में धागों से ज्यादा भ्रष्टाचार पिरोया गया था। आलम यह है कि 500 रुपये की जिस साड़ी को लेकर विभाग अपनी पीठ थपथपा रहा था, उसका मुनाफा बड़े नेता से लेकर 'सिंह' नाम (मध्य नाम) वाले एक रसूखदार अधिकारी तक आधा-आधा बांटा गया। अब जब साड़ी की लंबाई 5.5 मीटर से सिकुड़कर 5 मीटर रह गई और गुणवत्ता पर बवाल मचा, तो विभाग ने साड़ियां वापस मंगाने का फरमान जारी कर दिया है।

अंदरखाने से जो परतें उधड़ रही हैं, वह सत्ता के गलियारों में हड़कंप मचाने के लिए काफी हैं। आइए समझते हैं कि आखिर 9.7 करोड़ रुपये के इस 'साड़ी कांड' का पूरा सिंडिकेट कैसे काम कर रहा था।

 

खेल का मास्टरमाइंड: दोनों तरफ एक ही अफसर का राज

 

इस पूरे खेल की धुरी एक ऐसा वरिष्ठ आईएएस/अधिकारी रहा, जिसका मध्य नाम 'सिंह' है। इस 'सिंह' साहब के पास एक ही समय में दो अहम विभागों का प्रभार था। वह छत्तीसगढ़ खादी ग्रामोद्योग बोर्ड सप्लाई करने वाली संस्था के भी डायरेक्टर थे और महिला एवं बाल विकास विभाग (खरीदने वाली संस्था) में भी अहम कुर्सी पर काबिज थे।

 

सूत्रों की मानें तो, खरीदने का प्रपोजल भी सिंह साहब की कलम से तैयार हुआ और बेचने की रजामंदी भी उन्हीं की कलम से दी गई। इस दोहरे प्रभार का सीधा फायदा उठाकर खादी ग्रामोद्योग से साड़ी बेचने और WCD में उसे खरीदने का ऐसा 'मैच फिक्स' किया गया, जिसमें नियमों की जमकर धज्जियां उड़ाई गईं।

 

किसकी जेब में गया कितना माल?

 

NJV के पुख्ता सूत्रों के अनुसार, इस डील में कमीशन का बकायदा रेट कार्ड तय था। सप्लायर के तौर पर इस बड़े ऑर्डर का ठेका बलरामपुर के सत्यम अग्रवाल और धमतरी के पूर्व कांग्रेस विधायक के रिश्तेदार केतन दोषी को मिला। इन दोनों ने मिलकर पूरे प्रदेश में साड़ियों की सप्लाई की।

इस सप्लाई के एवज में जो मलाई काटी गई, उसके आंकड़े चौंकाने वाले हैं:

 जवाबदार नेता तक इस सौदे में सीधे 60 लाख रुपये का कट पहुंचाया गया।

 

दोहरे प्रभार वाले 'सिंह' साहब की जेब में 30 लाख रुपये गए

 

हद तो तब हो गई जब 500 रुपये की साड़ी की वास्तविक कीमत को इतना गिरा दिया गया कि बचे हुए मार्जिन (मुनाफे) को महिला नेता और उसी विभाग के एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी ने आधा-आधा बांट लिया।

 

500 रुपये की जिद और खादी बोर्ड की चेतावनी

 

इस पूरे घोटाले की पटकथा 26 मार्च 2025 को जारी उस आदेश के साथ लिखी गई थी, जिसमें आईसीडीएस योजना के तहत आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं-सहायिकाओं को दो-दो साड़ियां देने का प्रावधान किया गया। करीब 1.94 लाख साड़ियों की जरूरत थी। प्रति साड़ी 500 रुपये की दर तय की गई (जिसमें 300 रुपये केंद्रांश और 200 रुपये राज्यांश था)। कुल बजट करीब 9.7 करोड़ का था।

 

दिलचस्प बात यह है कि उस वक्त खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड ने साफ कह दिया था कि जीएसटी सहित एक अच्छी साड़ी की कीमत 718 रुपये से 860 रुपये के बीच आती है। 500 रुपये में सप्लाई संभव नहीं है। लेकिन 'आधा-आधा' बांटने की नीयत से बैठे सिंडिकेट ने इसी 500 रुपये की दर पर ही सप्लाई का दबाव बनाया और अपने चहेते सप्लायरों (सत्यम और केतन) को मैदान में उतार दिया।

 

5.5 मीटर की साड़ी कैसे हो गई 5 मीटर?

 

कम कीमत में ज्यादा मुनाफा कमाने का सीधा असर साड़ियों की गुणवत्ता पर पड़ा। सरकारी मापदंड के अनुसार साड़ी की लंबाई 5.5 मीटर होनी चाहिए थी। लेकिन जब साड़ियां जिलों में पहुंचीं और महिलाओं ने उन्हें पहना, तो पता चला कि साड़ियां 5 मीटर या उससे भी छोटी हैं। बुनाई इतनी घटिया थी कि एक-दो धुलाई में ही धागे उधड़ने लगे। जिन महिलाओं के लिए यह यूनिफॉर्म थी, उनके लिए इसे पहनना ही मुश्किल हो गया।

 

बवाल मचा तो शुरू हुआ डैमेज कंट्रोल

 

साड़ियों की घटिया क्वालिटी को लेकर जब आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं में आक्रोश पनपा और कांग्रेस ने निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए सियासी माहौल गरमाया, तब जाकर विभाग की नींद टूटी। विभागीय मंत्री महोदया को खुद सामने आकर कहना पड़ा कि जहां शिकायतें हैं, वहां साड़ियां बदली जाएंगी और वह स्वयं गुणवत्ता की जांच करेंगी।

अंततः 7 अप्रैल 2026 को महिला एवं बाल विकास विभाग को एक नया आदेश जारी करना पड़ा। राज्य स्तरीय समिति की जांच में यह पुष्ट हो गया कि साड़ियों की गुणवत्ता और लंबाई मानकों के अनुरूप नहीं है।

अब क्या है आदेश?

विभाग ने सभी जिलों को सख्त निर्देश दिए हैं कि एक सप्ताह के भीतर दोषपूर्ण साड़ियों को कार्यकर्ताओं से वापस लेकर पूरी रिपोर्ट संचालनालय को भेजी जाए। जो जिले समय पर जानकारी नहीं देंगे, वहां मान लिया जाएगा कि कोई गड़बड़ी नहीं है। विडंबना देखिए कि डैमेज कंट्रोल के तहत साड़ियों की नई आपूर्ति का जिम्मा फिर से उसी 'छत्तीसगढ़ खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड' को दिया गया है, जिसे दरकिनार कर पहले यह पूरा खेल रचा गया था।

बहरहाल, साड़ियां तो वापस मंगाई जा रही हैं, लेकिन सवाल यह है कि जो 90 लाख का कमीशन और साड़ी के पीछे का 'आधा-आधा' मुनाफा ऊपर तक बंट चुका है, क्या उसकी भी कभी रिकवरी होगी? या फिर 'सिंह' साहब और उनके आकाओं पर कोई कार्रवाई करने की जहमत यह सिस्टम उठा पाएगा?