रायपुर। छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक महकमे में इन दिनों 'एक से भले दो' वाला नया शगल हावी होता दिख रहा है। मंत्रालय के वातानुकूलित चेंबर हों, पुलिस मुख्यालय के दफ्तर या फिर घने जंगलों के बीच बने थाने-चौकियां, कई IAS, IPS और IFS अफसरों की निजी जिंदगी में 'पति, पत्नी और वो' का साया इस कदर गहरा गया है कि सरकारी कामकाज भगवान भरोसे नजर आते हैं। साहब लोग सुशासन के दौर में अपना 'तनाव' मिटाने के लिए जिस 'डबल इंजन' की राह पर निकले हैं, उसका खमियाजा आम जनता के साथ-साथ उनके खुद के परिवार भी भुगत रहे हैं। सिविल सेवा आचरण नियमों (कोड ऑफ कंडक्ट) और अदालती फरमानों की धज्जियां सरेआम उड़ाई जा रही हैं। प्रशासनिक हलकों में दबी जुबान में चर्चा है कि नौकरी की भागदौड़ में पत्नी से रिश्ते कब डबल रोल में तब्दील हो जाते हैं, यह खुद तजुर्बेकार अफसरों को पता नहीं चलता।

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इसी फेहरिस्त में 2014 बैच के भारतीय वन सेवा के अधिकारी पंकज राजपूत का किस्सा बेपर्दा हुआ है। लखनऊ की फैमिली कोर्ट से मुकदमा जीतने के बाद भी जब साहब ने कानूनी आदेशों को सिगरेट के धुएं की तरह हवा में उड़ा दिया, तो तंग आकर उनकी पत्नी अदिति सिंह ने सोशल मीडिया पर वीडियो जारी कर राज्य सरकार से वैधानिक कार्रवाई की गुहार लगाई है। पीड़ित पत्नी ने अदालत के दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए आपराधिक प्रकरण दर्ज करने की मांग रखी है।

 

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अदिति सिंह की आपबीती अफसरों की कार्यप्रणाली की असलियत बयान करती है। उन्होंने अपने अफसर पति पर लगातार मानसिक प्रताड़ना और अमर्यादित भाषा के इस्तेमाल का आरोप मढ़ा है। उनका कहना है कि पंकज राजपूत उन्हें हमेशा 'बुरी' कहकर बुलाते थे, यहां तक कि गर्भावस्था के नाजुक वक्त में भी इसी नाम से ताना मारा जाता रहा। बिजनौर की अदालत ने भी हाल ही में अधिकारी की मां निर्मला देवी द्वारा बहू पर दायर किए गए मुकदमे को फर्जी पाते हुए खारिज कर दिया है।

सबसे दिलचस्प वाकया बच्चे के भरण-पोषण का है। 2020 में जब अदालत का डंडा चला, तो IFS पिता ने अपने नाबालिग बेटे के लिए 8,000 रुपये महीने देना शुरू किया। लेकिन बैंक पासबुक के लेन-देन में इस रकम के आगे बाकायदा 'खर्चा' (Expenses) लिखा गया। अदिति के मुताबिक, अपनी ही औलाद की परवरिश और शिक्षा को महज़ 'खर्चा' मानना अफसर की मानसिकता और उनके उत्तरदायित्व-बोध को दर्शाता है। अब तो उन्होंने यह मामूली रकम देने से भी हाथ खड़े कर दिए हैं, जिससे पत्नी हताश है।

यह कहानी सिर्फ वन महकमे तक सिमटी नहीं है। पुलिस मुख्यालय (PHQ) के गलियारों में तो खाकी वाले अफसरों के 'दो-दो के खेल' की दास्तानें और भी चटपटी हैं। महकमे में चर्चा है कि अगर आचरण नियमों का हंटर ईमानदारी से चल जाए, तो आधे से ज्यादा आईपीएस और आईएएस अपनी कुर्सी से हाथ धो बैठेंगे। अफसरों के बीच 'BIGAMY' का यह वायरस पारिवारिक मूल्यों और सामाजिक नैतिकता को निगल रहा है। ऐसे 'नीडी' या 'ग्रीडी' अफसरों के रवैये से शासन की कार्यशैली पर बट्टा लग रहा है।फिलहाल, इस पूरे विवाद पर IFS पंकज राजपूत की तरफ से कोई जवाब या सफाई सामने नहीं आई है।