
सियासत की पिच पर बिलासपुर का 'पॉवर सेंटर' कहे जाने वाले दिग्गज विधायक और पूर्व मंत्री अमर अग्रवाल का 22 सितंबर को जन्मदिन है। समर्थकों का जोश हाई है, शहर के चौक-चौराहों से लेकर बंगले के आसपास तक बधाइयों वाले बैनर-पोस्टर सजने लगे है। लेकिन अचानक, नगर निगम का अमला हरकत में आया और बैनर-पोस्टर सफाचट! कार्रवाई का समय ऐसा कि शहर के सियासी गलियारों में सन्नाटे के साथ सवालों का शोर गूंज उठा है।
अपनों की सरकार, अपनों का निगम... फिर ये 'सफाई' क्यों?
सबसे दिलचस्प बात तो यहीं है कि नगर निगम की कमान जिस महापौर के हाथ में है, सियासत में उन्हें पूर्व मंत्री की ही 'सिपाही' माना जाता है। फिर ऐसा क्या हुआ कि निगम के अमले ने अपने ही कद्दावर नेता के पोस्टरों पर बेखौफ होकर कैंची चला दी? सत्ता अपनी, संगठन अपना... फिर किसके इशारे पर यह 'स्वच्छता अभियान' चलाया जा रहा है?
गुटबाजी की बू या कोई सियासत का खेल?
सारे समर्थक का गुस्सा उफान पर हैं, लेकिन मजाल है कि कोई खुलकर एक शब्द बोल दे। सभी जानते हैं कि बिलासपुर भाजपा की राजनीति में गुटबाजी की जड़ें पाताल तक हैं। क्या पार्टी के भीतर ही किसी दूसरे खेमे को अमर अग्रवाल का यह 'पॉवर शो' रास नहीं आ रहा? या फिर सत्ता के किसी नए केंद्र ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि अब शहर में हनक और हवा का रुख बदल रहा है?
सियासी गलियारों में चर्चा तेज
सूत्रों की मानें तो, निगम के अफसर बिना किसी ' वजनदार इशारे' के अमर अग्रवाल जैसे दिग्गज नेता के पोस्टर छूने की जुर्रत नहीं कर सकते। कयास तो यह भी लगाए जा रहे हैं कि क्या यह किसी नियम-कायदे का बहाना बनाकर अपनों को ही आईना दिखाने की कोशिश है?
सवाल कई हैं, लेकिन जवाब फिलहाल गुम हैं। वैसे सियासत का उसूल भी यही है—यहां मुस्कुराते हुए गले भी मिलते हैं और चुपके से सियासी जमीन के साथ-साथ पोस्टर भी खिसका दिए जाते हैं। फिलहाल, बिलासपुर की सड़कों से हटे ये पोस्टर बता रहे हैं कि अंदरखाने में सब कुछ 'ऑल इज वेल' तो कतई नहीं है।
