बिलासपुर जिले में जीवनदायिनी अरपा नदी का अस्तित्व अब भारी खतरे में पड़ गया है। रेत माफिया पूरी तरह से बेखौफ होकर नदी का सीना चीर रहे हैं। प्रशासनिक कार्रवाई से बचने के लिए अब इन माफियाओं ने एक नई तरकीब निकाल ली है। इन्होंने शहर से दूरी बनाकर ग्रामीण इलाकों को अपना सुरक्षित ठिकाना बना लिया है। बेलतरा विधानसभा क्षेत्र के बैमा नगोई रोड पर इसका एक बड़ा उदाहरण देखने को मिला है। यहां के खेतों में सौ ट्रैक्टर से भी ज्यादा रेत डंप करके रखी गई है। इस पूरे अवैध कारोबार को देखकर अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर इन रेत माफियाओं को किसका राजनीतिक संरक्षण मिला हुआ है।

बिना किसी बड़े सफेदपोश नेता या रसूखदार अफसर की शह के इतने बड़े पैमाने पर अवैध काम होना बिल्कुल भी मुमकिन नहीं है। पहले ये माफिया शहर के आसपास ही रेत का स्टॉक करते थे। वहां आम लोगों की नजर आसानी से पड़ जाती थी जिससे शिकायत होने और कार्रवाई का डर हमेशा बना रहता था। अब इस डर को खत्म करने के लिए माफियाओं ने सुनसान ग्रामीण इलाकों का रुख कर लिया है। अब किसानों के खुले खेतों को अवैध डंपिंग यार्ड में बदल दिया गया है। गांवों में निगरानी न के बराबर होती है। बारिश के मौसम में जब नदियों से रेत निकालना बंद हो जाता है तब इसी स्टॉक की गई रेत को मनमाने और बहुत महंगे दामों पर बेचा जाता है।

कोनी से लेकर कोटा तक अवैध खनन का यह काला खेल पूरी रात बेरोकटोक चलता है। कोनी तुकांडीह लोखंडी निरतु और कोटा के पास अरपा नदी में रात के अंधेरे में दर्जनों मशीनें और ट्रैक्टर उतारे जाते हैं। पुलिस और खनिज विभाग की कार्रवाई से बचने के लिए खनन का काम रात में होता है और दिन के उजाले में इसे गांवों में डंप किया जाता है। रेत के परिवहन के लिए ऐसे ट्रैक्टर और बड़े हाइवा ट्रकों का इस्तेमाल किया जा रहा है जिन पर कोई नंबर प्लेट ही नहीं होती। मुख्य मार्गों से होते हुए धड़ल्ले से यह रेत मुंगेली जांजगीर चांपा और आसपास के अन्य कई जिलों में सप्लाई की जा रही है।

इस अवैध कारोबार से सरकार को हर दिन लाखों रुपये के राजस्व का सीधा नुकसान हो रहा है। नियमों की खुलेआम अनदेखी हो रही है लेकिन पूरा सिस्टम आंखें मूंदे बैठा है। खेतों में रेत डंप होने से किसानों की उपजाऊ जमीन बंजर हो रही है। लगातार हो रहे इस अंधाधुंध खनन से पर्यावरण को भी गहरी चोट पहुंच रही है। ग्रामीणों ने साफ आरोप लगाया है कि जब वे इस अवैध काम की शिकायत करने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को फोन लगाते हैं तो उनका फोन ही नहीं उठता। कोई अधिकारी मौके पर झांकने तक नहीं आता। यह साफ इशारा करता है कि इस सिंडिकेट में नीचे से लेकर ऊपर तक के लोग शामिल हैं।

आखिर रेत माफिया इतने ताकतवर कैसे हो गए कि वे सीधे किसानों के खेतों पर कब्जा करके वहां रेत का पहाड़ खड़ा कर रहे हैं। क्या पुलिस और प्रशासन का तंत्र इतना कमजोर हो गया है कि उन्हें रात में दौड़ते बिना नंबर वाले ट्रैक्टर नजर नहीं आते। प्रशासन की यह निष्क्रियता कई सवाल खड़े करती है। इस पूरे मामले पर बिलासपुर खनिज विभाग के उप निदेशक किशोर गोलघाटे ने कहा है कि एक टीम भेजकर मौके की जांच कराई जाएगी। अगर खेतों में अवैध रूप से रेत डंप किए जाने की बात सही पाई जाती है तो विभाग सख्त कार्रवाई करेगा। डंप की गई पूरी रेत को जब्त भी किया जाएगा। अब देखना यह है कि यह बयान सिर्फ कागजों तक सीमित रहता है या सच में रसूखदार माफियाओं पर कोई बड़ी कार्रवाई होती है।