
रायपुर। छत्तीसगढ़ CGMSC में दवाओं की खरीदी को लेकर शासन के आदेश और उसके पालन के बीच बड़ा अंतर सामने आया है। आरोप है कि 2022 23 में जारी रेट कॉन्ट्रैक्ट की अवधि बढ़ाने के शासन के आदेश के बाद भी प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाई जा रही है। दूसरी ओर प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में जरूरी दवाओं और बच्चों की वैक्सीन की कमी की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं।
सूत्रों के अनुसार दवा खरीदी और सप्लाई से जुड़े अधिकारियों के बीच 6-4-4-4 का कमीशन स्ट्रक्चर तय होने की भी चर्चा है, जिसे लेकर विभागीय स्तर पर अंदरूनी असंतोष और पारदर्शिता पर चिंता बढ़ रही है।
जानकारी के अनुसार 2022 23 का टेंडर 18 महीने के लिए जारी किया गया था। नियमों के तहत एमडी को सीमित अवधि तक समय बढ़ाने का अधिकार था। इसके बाद विशेष परिस्थिति में रेट कॉन्ट्रैक्ट बढ़ाने का प्रस्ताव शासन को भेजा गया। स्वास्थ्य सचिव की मंजूरी के बाद स्वास्थ्य मंत्री, वित्त सचिव और वित्त मंत्री के स्तर पर परीक्षण की प्रक्रिया पूरी हुई। इसके बाद 24 जुलाई 2026 को छह महीने की अवधि बढ़ाने का आदेश जारी किया गया।
आरोप है कि इस आदेश के मुताबिक पुराने रेट कॉन्ट्रैक्ट के तहत दवाओं की खरीदी प्रक्रिया आगे बढ़नी थी, लेकिन CGMSC में अब तक इसका पूरा पालन नहीं हुआ। इसके बजाय नए टेंडर और नए रेट कार्ड की तैयारी की जा रही है। इससे दवाओं की खरीदी में देरी के साथ सरकार पर अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
इस पूरे मामले में CGMSC के प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर भी प्रश्न उठ रहे हैं। आरोप है कि शासन के स्पष्ट निर्देश के बाद भी प्रक्रिया लंबित रखी गई है। हालांकि इस संबंध में CGMSC के एमडी रितेश कुमार अग्रवाल का पक्ष सामने आना बाकी है।
दवाओं की खरीदी का असर अब अस्पतालों में दिखाई देने लगा है। महासमुंद जिले में बच्चों को दी जाने वाली रोटावायरस वैक्सीन पिछले दो से तीन महीने से उपलब्ध नहीं होने की जानकारी सामने आई है। जिला स्वास्थ्य विभाग के अनुसार वैक्सीन की आपूर्ति राज्य स्तर से होती है और सप्लाई रुकने के कारण सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में इसका स्टॉक खत्म हो गया है।
रोटावायरस वैक्सीन छोटे बच्चों को डेढ़ माह, दो माह और साढ़े तीन माह की उम्र में ड्रॉप्स के रूप में दी जाती है। इसकी कमी से नियमित टीकाकरण प्रभावित होने की आशंका है। निजी अस्पतालों में वैक्सीन उपलब्ध होने पर आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के सामने अतिरिक्त खर्च की समस्या खड़ी हो रही है।
प्रदेश के दूसरे सरकारी अस्पतालों में भी जरूरी दवाओं की उपलब्धता को लेकर शिकायतें हैं। रायपुर के मेकाहारा जैसे बड़े अस्पतालों में मरीजों और परिजनों को कई दवाएं बाहर से खरीदने की शिकायत मिलती रही है। अस्पतालों में दवाओं की सूची लंबी है, लेकिन सभी दवाएं काउंटर पर उपलब्ध नहीं होने का आरोप है।
मशीनों और स्टाफ की स्थिति भी चिंता का विषय है। कई अस्पतालों में पुरानी मशीनों से काम चलाने और नई मशीनों के लिए प्रशिक्षित ऑपरेटर नहीं होने की शिकायतें हैं। संविदा कर्मचारियों और नर्सिंग स्टाफ पर बढ़ती निर्भरता भी व्यवस्था की क्षमता पर सवाल खड़े करती है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब शासन स्तर पर दवाओं की खरीदी के लिए प्रक्रिया पूरी कर छह महीने की अवधि बढ़ाई गई थी, तो उसका पालन क्यों नहीं हुआ। दवाओं की कमी के बीच नई खरीदी प्रक्रिया में देरी का सीधा असर सरकारी अस्पतालों पर पड़ सकता है। अब स्वास्थ्य विभाग और CGMSC से यह स्पष्ट करने की जरूरत है कि आदेश के बावजूद रेट कॉन्ट्रैक्ट पर कार्रवाई क्यों लंबित है और अस्पतालों में जरूरी दवाओं तथा वैक्सीन की नियमित आपूर्ति कब तक बहाल होगी।