बिलासपुर/कोटा। बिलासपुर जिले के कोटा स्थित जल संसाधन विभाग के बहुचर्चित चांटापारा-टू एनीकट कम काजवे निर्माण घोटाले में जांच को भटकाने और आरोपियों को बचाने के खेल का एक के बाद एक खुलासा हो रहा है।

 वर्ष 2015 से 2020 के बीच चार बार क्षतिग्रस्त हुए इस प्रोजेक्ट में 1.4 मीटर गहरे फ्लोर की जगह महज 0.35 मीटर का निर्माण किया गया था। जांच को प्रभावित करने के लिए विभाग ने एफआईआर में नामजद मुख्य आरोपी आई.ए. सिद्दीकी की उसी कार्यालय में बतौर कार्यपालन अभियंता पदस्थापना कर दी , जहां मामले से जुड़े के महत्त्वपूर्ण दस्तावेज और ठेकेदार के बिल रखे हुए थे। वर्तमान में सिद्दीकी मुख्य अभियंता के प्रभार पर कार्यरत हैं। मामले में शिकायतकर्ता ने मुख्य सचिव से मांग की है कि दस्तावेजों को छिपाने और धोखाधड़ी के इस प्रकरण को दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम 1946 की धारा 5 और 6 के तहत सीबीआई (CBI) को सौंपा जाए।

बिना दस्तावेजों के एसीबी ने पेश किया खात्मा

दस्तावेजों को आरोपी के ही कब्जे में रखने का सीधा असर एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) की जांच पर पड़ा। एसीबी ने 25 जनवरी 2019 को जांच के लिए 19 बिंदुओं पर जानकारी मांगी और लगातार 6 रिमाइंडर भेजे। विभाग ने मूल दस्तावेज उपलब्ध ही नहीं कराए। इसके बावजूद जांच एजेंसी ने सीआरपीसी की धारा 91 का उपयोग कर दस्तावेज जब्त करने के बजाय, 26 मई 2023 को बिना मूल अभिलेखों के ही न्यायालय में क्लोजर (खात्मा) रिपोर्ट पेश कर दी। इस पूरे मामले में शासन के किसी भी वरिष्ठ अधिकारी के कथन दर्ज नहीं किए गए।

एक महीने बाद ही नियम ताक पर रखकर प्रमोशन

खात्मा रिपोर्ट पेश होने के ठीक एक महीने बाद 28 जून 2023 को मुख्य आरोपी सिद्दीकी को पदोन्नत कर दिया गया। विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) ने इस दौरान सुप्रीम कोर्ट के 'के.वी. जानकीरमन प्रकरण' में दिए गए सीलबंद लिफाफा नियम की स्पष्ट अनदेखी की। शिकायतकर्ता लक्ष्मीकांत निर्णेजक ने अपनी शिकायत में बताया है कि शासन ने 2 फरवरी 2021 को 10 बिंदुओं पर जानकारी मांगी थी, लेकिन 30 सितंबर 2022 से 3 जनवरी 2025 तक कोटा संभाग के कार्यपालन अभियंता के पद पर सिद्दीकी ही काबिज रहे, जिसके कारण कभी जवाब शासन तक नहीं पहुंचा।

आदेशों में विरोधाभास: छोटे अफसरों पर गिरी गाज

इस पूरे प्रकरण में विभाग के आदेश लगातार बदलते रहे। 25 फरवरी 2019 को शासन ने एक आदेश जारी कर कहा कि मामले में कोई प्रत्यक्ष वित्तीय क्षति नहीं हुई है। लेकिन इसी आदेश में लापरवाही मानते हुए दो जूनियर अफसरों (जी.के. फतनानी और कमलेश्वर सिंह) की एक-एक वेतनवृद्धि रोक दी गई। सवाल उठा कि जब वित्तीय क्षति नहीं हुई, तो सजा क्यों दी गई और नामजद आरोपी सिद्दीकी को क्यों छोड़ दिया गया? बाद में 15 जनवरी 2021 को शासन ने खुद माना कि निर्माण में भ्रष्टाचार हुआ है।

विधानसभा में दी गई गलत जानकारी

शिकायत के अनुसार, आरोपी को बचाने के लिए विभाग ने विधानसभा सत्र में असत्य जानकारी प्रस्तुत की। दूसरी ओर, प्रधान महालेखाकार (एजी) को कई वर्षों के स्मरण पत्रों के बाद दिए गए जवाब में विभाग ने स्वीकार किया कि एनीकट क्षतिग्रस्त हुआ है। शिकायतकर्ता ने विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर गलत उत्तर देने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई और एजी से विशेष लेखा परीक्षा की मांग की है।

'काजवे' शब्द उड़ाकर लाखों का गोलमाल

इस प्रोजेक्ट की शुरुआत 17 सितंबर 2009 को हुई थी। तब प्रशासकीय स्वीकृति 'चांटापारा-टू एनीकट कम काजवे' के नाम से जारी की गई थी। लेकिन बाद में तकनीकी स्वीकृति के दौरान दस्तावेजों में हेराफेरी की गई और 'काजवे' शब्द हटा दिया गया। मौके पर सिर्फ एनीकट बनाया गया और काजवे के नाम पर जारी लाखों रुपए का गोलमाल कर दिया गया।

सीबीआई जांच नहीं हुई तो हाईकोर्ट में लगेगी याचिका

शिकायतकर्ता ने मुख्य सचिव को लिखे पत्र में कहा है कि चूंकि आरोपी अधिकारी अब मुख्य अभियंता के पद पर है, इसलिए राज्य स्तर पर निष्पक्ष जांच संभव नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के 'पश्चिम बंगाल राज्य विरुद्ध लोकतांत्रिक अधिकार संरक्षण समिति' फैसले का हवाला देते हुए अल्टीमेटम दिया गया है कि यदि राज्य सरकार सीबीआई जांच की अधिसूचना जारी नहीं करती है, तो अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय में याचिका दायर की जाएगी।

शिकायतकर्ता ने विवादित अधिकारी की पदोन्नति निरस्त कर तत्काल प्रभाव से निलंबन की मांग की है। मुख्य सचिव कार्यालय द्वारा इस मामले में कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) को पत्र लिखे जाने की संभावनाओं पर विचार किया जा रहा है।