
बिलासपुर : सरकारी या सार्वजनिक जमीन पर सालों तक कब्जा जमाकर दुकान खड़ी कर लेना, पक्का निर्माण करा लेना और नियमित बिजली बिल व दूसरे शुल्क जमा करना किसी को उस जमीन का कानूनी हकदार नहीं बना सकता। कब्जे की अवधि कितनी भी लंबी क्यों न हो, यदि जमीन पर अधिकार नियमों के विरुद्ध हासिल किया गया है तो कानून की नजर में उसे वैध नहीं माना जा सकता। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बीएसपी की जमीन से जुड़े एक मामले में यह महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए दुकानदारों और व्यावसायिक संस्थानों को बड़ा झटका दिया है।
जस्टिस ए के प्रसाद की अदालत ने बीएसपी की जमीन पर लंबे समय से कारोबार कर रहे दुकानदारों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की ओर से दायर सभी 9 याचिकाएं खारिज कर दीं। अदालत ने स्पष्ट किया कि मूल आवंटन की शर्तों का उल्लंघन कर किसी दूसरे व्यक्ति के कब्जे में पहुंची जमीन पर कारोबार करने मात्र से कानूनी अधिकार पैदा नहीं हो जाता।
1976 में आवंटित भूखंडों पर बदल गए कब्जेदार
मामले की शुरुआत वर्ष 1976 से होती है। उस समय बीएसपी ने खुर्सीपार क्षेत्र में कारोबार के उद्देश्य से कुछ भूखंड आवंटित किए थे। लेकिन बाद में मूल आवंटियों से दूसरे लोगों ने इन भूखंडों का कब्जा हासिल कर लिया। समय बीतने के साथ इन जगहों पर दुकानें और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठान संचालित होने लगे। बीएसपी ने इसे आवंटन की शर्तों के विपरीत अनधिकृत कब्जा मानते हुए सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत कब्जाधारियों की बेदखली) अधिनियम, 1971 के तहत कार्रवाई शुरू की।
सालों से कर रहे कारोबार, अब बेदखली
बेदखली के आदेश को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं ने अदालत में दलील दी कि वे लंबे समय से संबंधित परिसरों में कारोबार कर रहे हैं। इस दौरान उन्होंने किराया, लाइसेंस फीस, बिजली बिल और संपत्ति कर जैसे शुल्क भी नियमित रूप से जमा किए हैं। उनका तर्क था कि इतने वर्षों बाद बेदखली के आदेश लागू करना उचित नहीं है और लंबे समय से चले आ रहे उनके कारोबार को संरक्षण मिलना चाहिए।
बीएसपी ने बताया आवंटन की शर्त
बीएसपी ने अदालत को बताया कि मूल आवंटन की शर्तों में स्पष्ट प्रतिबंध था। आवंटी भूखंड किसी अन्य व्यक्ति को हस्तांतरित नहीं कर सकता था, न ही उसे किराए पर दे सकता था और न ही किसी दूसरे के साथ साझेदारी में कारोबार कर सकता था। ऐसे में मूल आवंटी से जमीन का कब्जा लेने वाले लोगों का वहां कारोबार करना उन्हें कोई वैधानिक अधिकार नहीं देता।
कब्जे की दलील खारिज, 9 याचिकाएं निरस्त
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने बीएसपी का पक्ष स्वीकार किया। अदालत ने कहा कि अनुबंध और आवंटन की शर्तों के विपरीत किए गए हस्तांतरण के आधार पर कोई व्यक्ति जमीन पर कानूनी अधिकार का दावा नहीं कर सकता। केवल लंबे समय तक कब्जा बनाए रखने, पक्का निर्माण करने या बिजली और अन्य शुल्क जमा करने से अनधिकृत कब्जा वैध नहीं हो जाता। इसी आधार पर अदालत ने सभी 9 याचिकाएं खारिज कर दीं।
बेदखली के बाद अवमानना की शिकायत भी खारिज
इस विवाद से जुड़ा एक और मामला अवमानना याचिका के रूप में हाईकोर्ट पहुंचा था। एक कारोबारी ने बीएसपी के अधिकारी पर अदालत के आदेश की अवहेलना करने का आरोप लगाया था। उसका कहना था कि हाईकोर्ट ने 8 अप्रैल 2022 को परिसर की यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था, लेकिन इसके बावजूद 19 अप्रैल को उसे परिसर से बाहर कर दिया गया। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि अदालत के आदेश की जानबूझकर अवहेलना किए जाने का आरोप साबित नहीं हुआ है। लिहाजा अवमानना याचिका भी खारिज कर दी गई।