
बिलासपुर : गणपति बप्पा मोरया... अगले बरस तू जल्दी आ।
गणेश उत्सव के अंतिम दिन जब यह जयघोष गूंजता है और गणेश जी की प्रतिमा को जल में विसर्जित किया जाता है, तब शायद ही कोई जनता हो कि आखिर गणपति विसर्जन की यह परंपरा शुरू कैसे हुई। इसके पीछे एक ऐसी पौराणिक कथा है, जिसका संबंध सीधे महर्षि वेदव्यास और महाभारत के लेखन से जुड़ा है।
गणेश को मिला महाभारत लेखन का दायित्व
पौराणिक मान्यता के अनुसार महर्षि वेदव्यास के मन में महाभारत की विशाल कथा को लिखित रूप देने का विचार आया। कथा इतनी विस्तृत थी कि इसके लिए उन्हें ऐसे लेखक की आवश्यकता थी, जो अत्यंत तेज गति से लिख सके और लगातार लेखन कर सके। वेदव्यास ने गणेश को इसका दायित्व सौंपा। गणेश ने भी एक शर्त रखी कि वे तभी लेखन करेंगे, जब वेदव्यास कथा सुनाते समय एक क्षण के लिए भी नहीं रुकेंगे। वेदव्यास जी ने यह शर्त स्वीकार कर ली, लेकिन उन्होंने भी गणेश जी के सामने शर्त रखी कि वे प्रत्येक श्लोक को समझने के बाद ही उसे लिखेंगे। इसके बाद शुरू हुआ महाभारत का वह अद्भुत लेखन, जिसे भारतीय परंपरा में आज भी श्रद्धा के साथ याद किया जाता है।
दस दिनों तक चलता रहा लेखन
कथा के अनुसार वेदव्यास जी श्लोक बोलते जाते और गणेश उन्हें लिखते जाते। लेखन लगातार चलता रहा। गणेश ने बिना रुके महाभारत के श्लोकों को लिपिबद्ध किया। मान्यता है कि लगातार दस दिनों तक लेखन करने के कारण गणेश के शरीर का ताप बढ़ गया। कथा के कुछ रूपों में यह भी बताया जाता है कि उनके शरीर पर मिट्टी का लेप किया गया था, जो गर्मी के कारण सूखने लगा। महाभारत का लेखन पूरा होने के बाद गणेश को शीतलता देने के लिए महर्षि वेदव्यास ने उन्हें सरोवर में स्नान करने का सुझाव दिया। गणेश सरोवर के ठंडे जल में उतरे और स्नान किया। माना जाता है कि इस स्नान से उनके शरीर को शीतलता मिली।
यहीं से जुड़ी विसर्जन की परंपरा
यही प्रसंग गणेश विसर्जन की परंपरा से जोड़ा जाता है। मान्यता के अनुसार, महाभारत के लेखन में गणेश ने दस दिनों तक लगातार अपना योगदान दिया और दसवें दिन कथा पूरी होने के बाद सरोवर में स्नान किया। इसीलिए गणेश चतुर्थी पर स्थापना के बाद दस दिनों तक गणपति की पूजा और फिर अनंत चतुर्दशी पर जल में विसर्जन को इस कथा की स्मृति से जोड़ा जाता है। गणेश जी का विसर्जन केवल उत्सव के समापन की रस्म नहीं माना जाता, बल्कि इसे महाभारत लेखन से जुड़े उस प्रसंग की धार्मिक स्मृति के रूप में भी देखा जाता है।
कलम से शुरू हुई कथा, जल में हुआ समापन
इस कथा का सबसे सुंदर पक्ष यह है कि पूरी परंपरा को दो प्रतीकों से जोड़ा जाता है—लेखन और जल। एक ओर गणेश ने वेदव्यास की वाणी को अपने लेखन से महाभारत का रूप दिया, वहीं दूसरी ओर कथा पूरी होने के बाद शीतल जल में स्नान किया। इसी कारण गणेश उत्सव में स्थापना से लेकर विसर्जन तक की यात्रा को इस पौराणिक प्रसंग से जोड़कर देखा जाता है। गणेश की प्रतिमा दस दिनों तक हमारे बीच रहती है और फिर जल में विलीन हो जाती है। भक्त उन्हें विदा करते हुए अगले वर्ष फिर आने की कामना करते हैं।