
सियासत का एक अघोषित लेकिन अटल नियम है—जब पेड़ की कोई शाख खुद को जड़ से बड़ा समझने लगे, तो माली को छंटाई के लिए कैंची उठानी ही पड़ती है। भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने लंबे अंतराल के बाद देश के 24 राज्यों के संगठन में जो महा-सर्जरी की है, उसकी सबसे गहरी और चर्चित चीरा-फाड़ी छत्तीसगढ़ में देखने को मिली है। संदेश साफ और सीधा है—जिन क्षत्रपों ने सत्ता आने के बाद संगठन को हाशिये पर धकेल दिया था, पार्टी ने उन्हें ही छत्तीसगढ़ के राजनीतिक नक्शे से किनारे लगा दिया है।
राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी संभालने के बाद नितिन नबीन ने छत्तीसगढ़ की शतरंज पर अपनी पहली और सबसे सधी हुई चाल चली है। पांच साल तक छत्तीसगढ़ के प्रभारी रहकर नबीन ने विपक्ष के सूखे दिनों में प्रदेश की खाक छानी है। वे हर जिले के समीकरण और हर ब्लॉक अध्यक्ष की नब्ज से वाकिफ हैं। साल 2023 में भाजपा की सत्ता में वापसी के पीछे उनकी ही व्यूह-रचना थी। अब जब वे खुद दिल्ली के शिखर पर हैं, तो उन्होंने अपनी खाली हुई कुर्सी पर पूर्व केंद्रीय मंत्री और तेजतर्रार राष्ट्रीय महामंत्री स्मृति ईरानी को बिठाया है। साथ ही, बिहार के भाजपा नेता और राष्ट्रीय मंत्री सिद्धार्थ शंभु को सह-प्रभारी बनाकर नबीन ने यह भी सुनिश्चित कर लिया है कि रायपुर के कुशाभाऊ ठाकरे परिसर की चाबी पर उनकी पकड़ पहले जैसी ही मजबूत रहे।
दस साल का तिलिस्म टूटा: साय-जामवाल की विदाई और कर्मवीर की एंट्री
छत्तीसगढ़ भाजपा संगठन में पिछले एक दशक से जो चेहरे अघोषित रूप से ‘अंतिम सत्य’ माने जाते थे, उनकी अचानक विदाई ने राजनीतिक गलियारों में सन्नाटा पसार दिया है। जशपुर के सिरिमकेला गांव से निकलकर विभाग प्रचारक से सीधे 2016 में प्रदेश संगठन महामंत्री बने पवन साय को अब झारखंड रवाना कर दिया गया है। वहीं, 2020 में हिमाचल से आकर क्षेत्रीय संगठन मंत्री की कमान संभालने वाले अजय जामवाल को महाराष्ट्र की राह दिखा दी गई है। पवन साय ने 2018 की करारी हार का दंश भी झेला और 2023 में भूपेश बघेल की सरकार को उखाड़ फेंकने का जश्न भी देखा, लेकिन सत्ता के सुख ने संगठन के समीकरण बिगाड़ दिए। अब उनकी जगह मथुरा निवासी और 1993 से संघ के तपे-तपाए प्रचारक रहे कर्मवीर सिंह को छत्तीसगढ़ की कमान सौंपी गई है। उत्तर प्रदेश के दो संघ प्रांतों के प्रांत प्रचारक और 2022 से सितंबर 2026 तक झारखंड भाजपा के संगठन महामंत्री रहे कर्मवीर सिंह के कंधों पर अब पटरी से उतर चुके रथ को साधने की जिम्मेदारी है।
‘संगठन शिल्पी’ का हैंगओवर और समानांतर सत्ता का खेल
आखिर पवन साय की विदाई की पटकथा क्यों लिखी गई? सत्ता के गलियारों में फुसफुसाहट है कि 2023 में सरकार बनने के बाद पवन साय की सक्रियता संगठन गढ़ने से ज्यादा सत्ता के केंद्र के इर्द-गिर्द सिमट गई थी। बंगाल विधानसभा चुनाव में 50 से अधिक सीटों के प्रबंधन और वहां मिली सफलता के बाद उन्हें ‘संगठन शिल्पी’ का तमगा क्या मिला, उन्होंने छत्तीसगढ़ में संगठन के मूल काम से जैसे हाथ ही खींच लिया। सरकार और संगठन के बीच संवाद के पुल टूटते गए। सरकार को जब संगठन के साथ की जरूरत होती, तो संगठन कहीं और उलझा नजर आता। सबसे गंभीर बात यह उभरी कि पवन साय ने अपने करीब एक दर्जन चहेतों के साथ मिलकर सरकार के समानांतर एक अलग ही व्यवस्था खड़ी कर ली थी। जब संगठन के भीतर से ही समानांतर सरकार चलने लगे, तो सत्ता में बैठे लोगों का असहज होना स्वाभाविक था।
‘देवतुल्य’ कार्यकर्ताओं का टूटा सब्र और इस्तीफों की झड़ी
पांच साल तक विपक्ष में रहकर लाठियां खाने वाला भाजपा का ‘देवतुल्य’ कार्यकर्ता जब अपनी ही सरकार में बेगाना हो गया, तो गुस्से का लावा फूट पड़ा। आलम यह रहा कि न सरकार में सुनवाई हुई और न संगठन ने आंसू पोंछे। नतीजा सामूहिक इस्तीफों की सुनामी के रूप में सामने आया:
- जुलाई 2024: लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद धमतरी में उपेक्षा से आहत कार्यकर्ताओं ने सामूहिक इस्तीफे दे दिए।
- जुलाई 2025: नारायणपुर जिले में बेलगाम प्रशासनिक अफसरों के रवैये से तंग आकर भाजपा के जनप्रतिनिधियों और पदाधिकारियों ने सीधे मुख्यमंत्री को सामूहिक इस्तीफे की चिट्ठी भेज दी।
- सितंबर 2025: धमतरी में भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने पर जब सत्ता और संगठन दोनों ने कान बंद कर लिए, तो 400 कार्यकर्ताओं ने जिला भाजपा कार्यालय पहुंचकर जिलाध्यक्ष को इस्तीफा सौंप दिया।
- भिलाई और डोंगरगढ़ का घमासान: भिलाई में भाजयुमो कार्यकारिणी की दो समानांतर सूचियां जारी होने से गुटबाजी सड़कों पर आ गई। उधर राजनांदगांव के डोंगरगढ़ शहर मंडल में मंडल अध्यक्ष जसमीत सिंह बन्नोआना पर परिवारवाद और प्रदेश उपाध्यक्ष व पूर्व विधायक रामजी भारती के इशारे पर पुराने कार्यकर्ताओं को कुचलने का आरोप लगाते हुए 111 नेताओं-कार्यकर्ताओं ने पार्टी छोड़ दी। 1 अगस्त तक 25 और इस्तीफों के साथ यह आंकड़ा 136 पर पहुंच गया।
इसी बीच भाजयुमो के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष रवि भगत की पार्टी से बर्खास्तगी ने आग में घी का काम किया। हैरानी की बात यह रही कि प्रदेश भर में हजारों कार्यकर्ता टूटते रहे, मगर संगठन के सिपहसालारों ने उन्हें मनाने की जहमत तक नहीं उठाई।
1500 करोड़ का एआई वीडियो कांड: घर के चिरागों से ही झुलसी सियासत!
सरकार और संगठन के बीच की खाई उस वक्त सरेआम हो गई, जब दिसंबर 2025 में एक एआई (AI) जनरेटेड एनिमेटेड वीडियो ने प्रदेश की राजनीति में भूचाल ला दिया। इस वीडियो में तत्कालीन प्रभारी नितिन नबीन को मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय से 1500 करोड़ रुपये की मांग करते दिखाया गया था। वीडियो के जरिए मुख्यमंत्री साय, दोनों उपमुख्यमंत्री अरुण साव व विजय शर्मा, वित्त मंत्री ओपी चौधरी, अजय जामवाल, पवन साय और कोषाध्यक्ष राम गर्ग तक की साख पर कीचड़ उछाला गया। आनन-फानन में विधायक पुरंदर मिश्रा ने सिविल लाइन थाने में एफआईआर दर्ज कराई। पुलिस ने जब परतें उधेड़ीं, तो पता चला कि इस आग को हवा देने वाले हाथ कहीं बाहर के नहीं, बल्कि भाजपा की ही सोशल मीडिया टीम से जुड़े थे। अंकित दुबे, आकाश जोशी, जावेद और यश जैसे नाम सामने आए और पांच गिरफ्तारियां हुईं। बाद में पुलिस ने भले ही एनएसयूआई के असलम मिर्जा को इसका मास्टरमाइंड करार दिया, लेकिन इस कांड ने भाजपा के भीतर चल रहे शीतयुद्ध को बेनकाब कर दिया।
सौम्य मुख्यमंत्री, बेलगाम अफसरशाही और नई तिकड़ी का अग्निपथ
इस दिसंबर में विष्णुदेव साय की सरकार अपने तीन साल पूरे कर चुनावी मोड़ में प्रवेश कर जाएगी। ऐसे नाजुक वक्त में स्मृति ईरानी, सिद्धार्थ शंभु और कर्मवीर सिंह की नई तिकड़ी के सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ा है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सौम्यता और सरल स्वभाव को प्रदेश की अफसरशाही ने उनकी कमजोरी समझ लिया है। ऊपर से पहली बार मंत्री बने कई माननीयों की अनुभवहीनता और भटकाव ने पूरे सिस्टम को ही पटरी से उतार दिया है। नई टीम के सामने सबसे बड़ा इम्तिहान रूठे हुए हजारों कार्यकर्ताओं के जख्मों पर मरहम लगाने, बेलगाम नौकरशाही की नकेल कसने और भटके हुए मंत्रियों को वापस ट्रैक पर लाने का है। दिल्ली ने तो अपना तीर चला दिया है, अब देखना यह है कि रायपुर में यह निशाना कितना सटीक बैठता है!