बिलासपुर : गांव की पगडंडियों से शुरू हुआ सफर जब सत्ता के शिखर तक पहुंचता है, तो उसके पीछे संघर्ष, संगठन और समाजसेवा की कई कहानियां छिपी होती हैं। छत्तीसगढ़ के उप मुख्यमंत्री अरुण साव की जिंदगी भी ऐसे ही अनगिनत अनुभवों से होकर गुजरी है। खेत-खलिहान में बचपन बीता, गिल्ली-डंडा और भौंरा के खेल, संघ की शाखा से संस्कार मिले, छात्र राजनीति में संगठनात्मक संघर्ष, वकालत के पेशे की चुनौतियां और समाजसेवा के शुरुआती प्रयास, इन सभी पड़ावों ने उनके सार्वजनिक जीवन की दिशा तय की। बिलासपुर प्रेस क्लब के पारंपरिक कार्यक्रम ‘हमर पहुना’ में अरुण साव ने अपनी जिंदगी के ऐसे ही अनकहे पन्ने खोले और उन दिनों को याद किया, जब राजनीतिक पहचान से पहले समाज के बीच काम करना और लोगों की समस्याओं के लिए खड़े होना उनकी सक्रियता का आधार था।

गांव की मिट्टी से मिली संस्कारों की नींव

मुंगेली जिले के लोहरिया गांव में किसान परिवार के बीच पले-बढ़े साव ने अपने बचपन को याद करते हुए बताया कि उनकी शुरुआती दुनिया खेत-खलिहान, तालाब और ग्रामीण खेलों के इर्द-गिर्द घूमती थी। गिल्ली-डंडा और भौंरा उनके पसंदीदा खेल थे। गांव में तीसरी कक्षा तक पढ़ाई करने के बाद चौथी कक्षा से मुंगेली में शिक्षा शुरू हुई। यहां मोहल्ले के बाल मंदिर में खेलना और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में जाना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया। उनके दादा बड़े किसान थे, जबकि पिता पेशे से वकील होने के साथ गांव में तीन-चार बार सरपंच भी रहे। पिता ने जनता पार्टी और भाजपा में संगठनात्मक जिम्मेदारियां निभाई। परिवार में सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों का माहौल जरूर था, लेकिन अरुण साव ने अपनी पहचान छात्र राजनीति और संगठन के बीच लगातार काम करते हुए बनाई।

छात्र राजनीति से राष्ट्रीय कार्यसमिति तक का सफर

कॉलेज के दिनों में छात्र प्रतिनिधि, साहित्यिक सचिव और सांस्कृतिक सचिव जैसे दायित्वों ने साव की सार्वजनिक सक्रियता को दिशा दी। वर्ष 1990 में वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की मुंगेली इकाई के अध्यक्ष बने। इसके बाद इकाई अध्यक्ष से प्रांत सहमंत्री, विभाग प्रमुख, संभाग प्रमुख और राष्ट्रीय कार्यसमिति सदस्य तक संगठन में अलग-अलग जिम्मेदारियां संभालीं। के आर लॉ कॉलेज, बिलासपुर से एलएलबी की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने युवा मोर्चा में काम किया। मंडल से जिला और प्रदेश स्तर तक संगठनात्मक जिम्मेदारियों का अनुभव हासिल किया। इस दौरान छात्र हितों और सार्वजनिक मुद्दों को लेकर सक्रियता उनके राजनीतिक सफर का अहम हिस्सा बनी।

वकालत से संसद, फिर उप मुख्यमंत्री की कुर्सी तक

वर्ष 1996 में मुंगेली में वकालत शुरू करने वाले साव दिसंबर 2000 में बिलासपुर में उच्च न्यायालय की शुरुआत के बाद यहां आ गए। उच्च शासकीय अधिवक्ता, शासकीय अधिवक्ता और उप महाधिवक्ता जैसे दायित्वों के जरिए उन्होंने न्यायिक क्षेत्र में भी काम किया। इसके बाद उनकी राजनीतिक यात्रा ने नए पड़ाव तय किए। वर्ष 2019 में लोकसभा चुनाव जीतकर वे संसद पहुंचे। वर्ष 2022 में उन्हें प्रदेश भाजपा अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली। वर्ष 2023 में लोरमी विधानसभा क्षेत्र से विधायक निर्वाचित होने के बाद वे छत्तीसगढ़ के उप मुख्यमंत्री बने। गांव से शुरू हुआ यह सफर छात्र राजनीति, संगठन, वकालत और चुनावी राजनीति के विभिन्न पड़ावों से गुजरते हुए प्रदेश सरकार की अहम जिम्मेदारी तक पहुंचा।

500 लोगों के रक्त परीक्षण से शुरू हुई सेवा की मुहिम

अरुण साव ने अपने सामाजिक जीवन के उन अनुभवों को भी साझा किया, जिनमें राजनीति से अलग जरूरतमंदों की मदद प्राथमिकता रही। वर्ष 1996 में मुंगेली में रक्तदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने और रक्त समूह की जांच के लिए शिविर आयोजित कराया गया। उस दौर में रक्तदान को लेकर लोगों के मन में संकोच और भय था। ऐसे माहौल में सहमति पत्र भरवाकर करीब 500 लोगों के रक्त समूह की जांच कराई गई। रक्तदाताओं की जानकारी जुटाकर एक निर्देशिका तैयार की गई और उसे डॉक्टरों तथा मेडिकल स्टोरों तक पहुंचाया गया, ताकि जरूरत पड़ने पर मरीजों को समय पर रक्तदाता उपलब्ध हो सकें। यह पहल जरूरतमंद मरीजों और रक्तदाताओं के बीच संपर्क स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास थी।

नेत्र शिविरों से लेकर अंतिम संस्कार तक निभाई सामाजिक जिम्मेदारी

साव ने मुंगेली के मिशन अस्पताल में आयोजित नेत्र शिविरों के दौरान करीब सौ कार्यकर्ताओं के साथ मरीजों की सहायता और व्यवस्थाओं में जुटने के अनुभव भी बताए। लावारिस शवों के अंतिम संस्कार में सहयोग करना और स्कूल-कॉलेज की समस्याओं को लेकर आवाज उठाना भी उनकी सामाजिक सक्रियता का हिस्सा रहा। ‘हमर पहुना’ में साझा किए गए ये स्मृति अरुण साव की सार्वजनिक यात्रा के कई पड़ाव सामने लाते हैंl ग्रामीण परिवेश में बीता बचपन, छात्र राजनीति में संगठनात्मक प्रशिक्षण, वकालत का पेशा, समाजसेवा के प्रयास और फिर संसदीय व प्रदेश की राजनीति में बढ़ती जिम्मेदारियां। उनके जीवन के ये प्रसंग बताते हैं कि उनकी राजनीतिक यात्रा केवल पदों के क्रम तक सीमित नहीं, बल्कि वर्षो के संगठनात्मक और सामाजिक अनुभवों से भी जुड़ी रही है।