
रायपुर। छत्तीसगढ़ विधानसभा के मानसून सत्र में तखतपुर क्षेत्र का कोपरा जलाशय और उसके आसपास संचालित कोयला भंडारण डिपो का मामला उठा। तखतपुर विधायक धर्मजीत सिंह ने सरकार से पूछा कि कोपरा जलाशय के आसपास कितने कोल डिपो चल रहे हैं, उनकी जांच कब-कब हुई और उन पर क्या कार्रवाई की गई। जवाब में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने बताया कि कोपरा जलाशय को 12 दिसंबर 2025 को छत्तीसगढ़ वेटलैंड अथॉरिटी ने रामसर साइट के रूप में चिन्हांकित किया है, लेकिन रामसर साइट से 10 किलोमीटर के दायरे में कोल डिपो संचालन को लेकर अभी तक कोई अलग दिशा-निर्देश जारी नहीं किए गए हैं।
सरकार के इस जवाब से यह भी सामने आया कि जलाशय को रामसर साइट का दर्जा मिलने के बाद भी उसके आसपास चल रहे कोयला भंडारण केंद्रों पर किसी तरह की रोक नहीं लगाई गई है। सरकार ने इसका कारण स्पष्ट नियमों का अभाव बताया है। इसी वजह से अब तक किसी डिपो को बंद करने या हटाने का आदेश जारी नहीं किया गया।
मुख्यमंत्री ने सदन में बताया कि वर्ष 2024-25 और 2025-26 के दौरान इन भंडारण केंद्रों की लगातार जांच कराई गई। जांच में मिली कमियों और अनियमितताओं पर की गई कार्रवाई का पूरा विवरण विधानसभा पुस्तकालय में रखा गया है। साथ ही पर्यावरण विभाग की शर्तों के पालन की भी समीक्षा की जा रही है। कोयला डिपो से उड़ने वाली धूल का स्थानीय पर्यावरण पर क्या असर पड़ रहा है, इसकी भी जांच चल रही है।
मामले का एक दूसरा पहलू भी सामने आया है। सरकार ने माना कि 10 किलोमीटर के दायरे में कोल डिपो संचालन को लेकर कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं है। ऐसे में जांच तो हो रही है, लेकिन कार्रवाई सीमित दायरे में ही हो पा रही है। इससे यह सवाल भी उठ रहा है कि रामसर साइट घोषित होने के बाद संरक्षण की व्यवस्था और संचालन संबंधी नियमों के बीच तालमेल कैसे बनाया जाएगा।
जानकारों का कहना है कि रामसर साइट को पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है। सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार ऐसे क्षेत्रों के आसपास कम से कम एक किलोमीटर का इको-सेंसिटिव जोन होना चाहिए। वहीं आर्द्रभूमि संरक्षण एवं प्रबंधन नियम 2017 में ठोस कचरा डंपिंग और खतरनाक पदार्थों के भंडारण पर रोक का प्रावधान है। इसके अलावा 10 किलोमीटर के दायरे को प्रभाव क्षेत्र माना जाता है, जहां नए कोल डिपो या भारी उद्योग के लिए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की मंजूरी जरूरी होती है।
स्थानीय स्तर पर भी इस मुद्दे को लेकर चर्चा है। पर्यावरण से जुड़े लोगों का कहना है कि कोयले की धूल हवा के साथ जलाशय तक पहुंच सकती है। इससे पानी की गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका रहती है। कोपरा जलाशय प्रवासी पक्षियों और जैव विविधता के लिए जाना जाता है।